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टूटा व्यक्तित्व

डा. महेंद्र भटनागर

बचपन में
किसी ने यदि —
न देखा
स्नेह-सिंचित दृष्टि से
अति चाव से,
और पुचकारा नहीं
भर अंक
वत्सल-भाव से,
तो व्यक्ति का व्यक्तित्व
निश्चित
टूटता है।
.
यौवन में
नहीं यदि —
पा सका कोई
प्रणयिनी
संगिनी का
प्रेम:
निश्छल
एकनिष्ठ
अनन्य !
जीवन —
शुष्क
बोझिल
मरुस्थल मात्र
तृष्णा-जन्य !
तो उस व्यक्ति का व्यक्तित्व
अन्दर और बाहर से
बराबर
टूटता है।
.
वृद्ध होने पर
नहीं देती सुनायी
यदि —
प्रतिष्ठा-मान की वाणी,
न सुनना चाहता कोई
स्व-अनुभव की कहानी,
मूक
इस अन्तिम चरण पर
व्यक्ति का व्यक्तित्व
सचमुच,
चरमराता है
सदा को
टूट जाता है !

Comments

सही कहा है यदि घर में किसी नए बच्चे क जन्म होता है तो बडे बच्चे के साथ क*इ लोग एसा ही व्यव्हार करते हैं। वो बच्चा भी इसी तरहाँ टूट जाता है मानो उसका कोइ वज़ुद ही नहिं उस घर में।

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