- डॉ. शोभारानी श्रीवास्तव मानव जीवन के सर्वांगीण विकास में नर-नारी का समान योगदान है। भारतीय दर्शन एवं धर्म में ऐसी मान्यता है कि शिव शक्ति के बिना व्यक्ति शव के समान है। ‘शतपथ ब्राह्मण' में कहा गया है - पत्नी पुरुष की आत्मा का आधा भाग है। महाभारत में बताया गया है कि भार्या मनुष्य का आधा भाग है तथा श्रेष्ठतम् मित्र है। वेदकालीन संस्कृति में हमें नारियों के दो रूप मिलते हैं - दिव्य देवी रूप तथा सामाजिक। भारत में आर्य सभ्यता के पूर्व भी नारी को रहस्यमयी शक्ति ही माना गया था। यह भी तथ्य है कि अनेक देशों की संस्कृति में पशु और नारी में आत्मा की स्थिति ही नहीं स्वीकार की गई; किन्तु भारतीय संस्कृति ने नारी के आत्म रूप को ही नहीं उसके दिव्यात्म रूप को ऐसी प्रतिष्ठा दी जो देशकाल के परिवर्तन क्रम में परिवर्तित होते ही तत्त्वतः अपने मूल रूप में पहुँच गयी तथा भारतीय जीवन पद्धति में भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। यदि केवल जन्म देने की रहस्यमयता ही स्त्री के महत्त्व का कारण होती तो तत्त्वतः पूजाई रूप प्राणिशास्त्रा के विज्ञान के विकास की चकाचौंध में खो जाता किन्तु उसका दिव्यात्मा र...
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