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महादेवी वर्मा का नारी विषयक दृष्टिकोण

- डॉ. शोभारानी श्रीवास्तव मानव जीवन के सर्वांगीण विकास में नर-नारी का समान योगदान है। भारतीय दर्शन एवं धर्म में ऐसी मान्यता है कि शिव शक्ति के बिना व्यक्ति शव के समान है। ‘शतपथ ब्राह्मण' में कहा गया है - पत्नी पुरुष की आत्मा का आधा भाग है। महाभारत में बताया गया है कि भार्या मनुष्य का आधा भाग है तथा श्रेष्ठतम्‌ मित्र है। वेदकालीन संस्कृति में हमें नारियों के दो रूप मिलते हैं - दिव्य देवी रूप तथा सामाजिक। भारत में आर्य सभ्यता के पूर्व भी नारी को रहस्यमयी शक्ति ही माना गया था। यह भी तथ्य है कि अनेक देशों की संस्कृति में पशु और नारी में आत्मा की स्थिति ही नहीं स्वीकार की गई; किन्तु भारतीय संस्कृति ने नारी के आत्म रूप को ही नहीं उसके दिव्यात्म रूप को ऐसी प्रतिष्ठा दी जो देशकाल के परिवर्तन क्रम में परिवर्तित होते ही तत्त्वतः अपने मूल रूप में पहुँच गयी तथा भारतीय जीवन पद्धति में भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। यदि केवल जन्म देने की रहस्यमयता ही स्त्री के महत्त्व का कारण होती तो तत्त्वतः पूजाई रूप प्राणिशास्त्रा के विज्ञान के विकास की चकाचौंध में खो जाता किन्तु उसका दिव्यात्मा र...

संवेदना और पीड़ा की चित्रकार मुक्तिकामी रचनाकार नासिरा शर्मा

- ललित शुक्ल नासिरा शर्मा ने स्त्री-विमर्श पर अपने किरदारों के माध्यम से समय-समय पर काफ़ी कुछ कहा है। वैसे हिन्दी कथा साहित्य में, पत्र-पत्रिकाओं में काफ़ी कहा-सुनी होती रहती है। इस प्रकार की प्रस्तुतियों से यह पता नहीं चलता है कि जिस नारी की चर्चा हो रही है वह कौन है? उसकी शिक्षा का स्तर क्या है? समाज में वह नगण्य है या उसकी कोई इज्जत है। वह अशिक्षित है या क ख अथवा अलिफ बे से परिचित है। बस नारी-नारी की रट लगाकर विमर्श का ताना-बाना तैयार हो जाता है और लेखक को नारीवादी होने की सौगात मिल जाती है और तो और कतिपय कलमों की साहित्यिक दुकानदारी नारी-विमर्श के ही बल पर चल रही है। उनके लिए यह घाटे का सौदा नहीं है। इस महादेश में स्त्री या नारी मात्र कह देने से बात स्पष्ट नहीं होती है। वस्तुतः इसमें कई पर्तें हैं। विमर्श के पहले इस बात का खुलासा होना चाहिए कि किस नारी पर बात हो रही है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम उजाले में और उजाला फेंक रहे हैं। उन अंधी गलियों की ओर किसी क़लम या विचार का ध्यान नहीं जा रहा है जो सदियों से गाढ़ी कालिमा से ओत-प्रोत हैं। वहाँ तरक्की की किरणें नहीं पहुँच पातीं। लेखक ...

मुस्लिम स्त्रियाँ : स्वप्न और संघर्ष

- डॉ. तारिक असलम ‘तस्नीम' यह कैसी विडम्बनापूर्ण स्थिति है कि एक ओर विश्व के अनेक जातियों और समाज की स्त्रियाँ अनेक क्षेत्रों में न केवल पुरुषों से कांधा से कांधा मिलाकर साथ चल रही हैं, बल्कि कुछ एक क्षेत्रों में कठोर प्रतिस्पर्धा की चुनौतियों का बखूबी सामना कर रही हैं। लेकिन क्या भारतीय मुस्लिम समाज की स्त्रियों के संदर्भ में ऐसी कल्पना की जा सकती है? निस्संदेह मुस्लिम समाज में अनेक ऐसी जातियाँ हैं, जिनकी महिलाएँ अपने स्वप्न और संघर्ष से कोसों दूर पगडंडी पर खड़ी अपलक चाँद को निहार कर ही संतुष्ट हैं। वहाँ तक पहुँचने का उनके मन में कोई ख्वाब नहीं है। वास्तव में जिनके कांधों पर चाँद तक पहुँचने का साधन मुहैया कराने की जिम्मेदारी है। वे अपनी जिम्मेदारी के निर्वाह में कोताही बरतते रहे हैं। स्त्रियों को बच्चे जनने की मशीन समझ रखा है। वे उनकी खेतियाँ हैं, जिसे वे जैसे चाहें इस्तेमाल करके संतुष्ट हैं। स्त्रियाँ उनके आचरण और व्यवहार से संतुष्ट हों या नहीं? यह सवाल उसके लिए समाज ने हराम करार दे रखा है। नतीजतन आज इस देश की दूसरी सबसे बड़ी बहुसंख्यक आबादी का एक बड़ा हिस्सा जो मुस्लिम स्...

आधुनिक समाज में नारी-मुक्ति का प्रश्न

- डॉ० जय प्रकाश यादव आधुनिक समाज के लिए नारी मुक्ति कोई अमूर्त या काल्पनिक अवधारणा नहीं है, बल्कि एक यथार्थवादी और ठोस अवधारणा है जबकि इसके समर्थक अभी बहुत कम हैं। इनमें से बहुत ऐसे हैं जो सतही मन से इसका समर्थन करते हैं और निजी जिन्दगी में अपनी पत्नी के साथ क्रूरता से व्यवहार करते हैं जबकि मंच से इसका जोरदार विरोध करते हैं। इस अवधारणा का सीधा सम्बन्ध सामाजिक होने के कारण लगातार पिसने वाली स्त्री के जीवन के उन पड़ावों से है जिसमें वह पुरुष की सामंती मानसिकता का साक्ष्य प्रस्तुत करती है। लोग वर्ग की बात करते हैं दलित, मुस्लिम, अगड़ा, पिछड़ा, किन्तु किसी भी वर्ग का पुरुष नारी के लिए सिर्फ पुरुष ही साबित होता है। स्पष्ट है कि स्वयं को गुलामी से मुक्ति की आवाज उठाने वाला पुरुष वर्ग भी नारी के लिए वही व्यवस्था, कायदे-कानून रखना चाहता है जो स्वयं उसे स्वीकार्य नहीं हैं। स्त्री उसी समाज का अविभाज्य अंग है, जिसे पुरुषों ने अपने स्वार्थ में निर्मित किया है। इसलिए नारी की मुक्ति इस सामाजिक ढाँचे में बदलाव के बिना असंभव है। क्योंकि नारी मुक्ति समूचे समाज की वास्तविक मुक्ति का अनिवार्य अंग है। सम...

स्त्रीवादी लेखन : स्वरूप और संभावनायें

- डॉ. हरेराम पाठक स्त्रीवादी लेखन क्या है? उसका समग्र रूप क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर देती हुई प्रसिद्ध स्त्रीवादी लेखिका वी. वीरलक्ष्मी देवी कहती हैं - ‘‘पितृ सत्तात्मक समाज की पहचान के रूप में चले आ रहे स्त्री के वक्ष को ढकने वाले पल्लू को जला डालने का काम सबसे पहले करना चाहिए। यह बताने के लिए जय प्रभा ने ‘‘पल्लू को फूँक दो'' नामक कविता लिखी।'' ‘‘जिस संस्कृति ने पुरुषों द्वारा स्त्री के ऊपर चटखारे भरा वर्णन किया जाता है, उस संस्कृति को खत्म कर देना है।'' ‘‘अपने शारीरिक परिवर्तनों के प्रति स्त्री का स्पंदन स्वानुभूति के आधार पर होना चाहिए।'' ‘‘रजोधर्म स्त्री की प्रकृति-दत्त क्रिया है। उसको धार्मिक प्रतिबंधों के घेरे में लाकर और निषिद्ध विषय के रूप में चित्रिात करके स्त्री की अवमानना की गई है। समाज में बद्धमूल इस विचार पद्धति का मूलोच्छेद अत्यंत आवश्यक है।'' ‘‘संतानोत्पत्ति के केन्द्र के रूप में परिणत स्त्री को और इसमें स्वेच्छा न रखने वाली स्त्री को अपनी प्रसव वेदना का उद्घोष करने की जो आवश्यकता है, उसे स्त्रीवादी कवयित्रिा...

नारीवादी लेखन : दशा और दिशा

- डॉ. शशिप्रभा पाण्डेय हिन्दी साहित्य में पिछले पचास वर्षों में अनेकानेक परिवर्तन दृष्टिगोचर हुए। अनेक नए आन्दोलन नई धुरी के रूप में साहित्य की दुनिया में सम्मिलित हुए। नारीवादी विमर्श भी इन्हीं में से एक है। आज नारीवाद की नयी भाषा, नया दृष्टिकोण सर्वत्रा नज+र आ रहा है। हमारी जिस खामोशी ने हमें कैद कर रखा था वह अब तार्किकता और प्रश्नाकुलता की तरफ बढ़ रही है। सम्पूर्ण साहित्य में नारी लेखन सहजता, गंभीरता और बिना किसी अवरोध के अपनी तकलीफों, विषादों और व्यथाओं को व्यक्त कर रहा है। निश्चित ही यह बदलाव क्रांतिकारी बदलाव है।१ बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भावबोध से उत्प्रेरित साहित्य की रचना में सबसे महत्त्वपूर्ण हाथ नारी चेतना का रहा है। प्रश्न उठता है कि यह नारी चेतना आख़िर है क्या? चेतना का सम्बन्ध निजी जीवनदृष्टि से होता है जिसके द्वारा इतिहास, संस्कृति और मानवीय सम्बन्धों को पुनः विश्लेषित किया जाता है। कह सकते हैं कि जो दृष्टि नारी की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक दृष्टि के तिलिस्म को तोड़े वह नारी चेतना है। यह चेतना स्त्री पुरुष दोनों में हो सकती है। इसका संबंध वर्ग, वर्ण, धर...

गजल

रचना गौड़ भारती जज्बात और महक जो काबू में आ जाते इंसान भी फ़रिश्तें की गिनती में आ जाते खत्म होगई थी रोशनाई लिखते लिखते वरना जज्बात हमारे भी कागज पे आ जाते पहले ही क्या कम थे यहां सागर खारे काबू कर न पाते तो आंख में आंसू आ जाते हर जख्म भरता नहीं बिना मरहम के कुछ शब्द ही होते जो इसके काम आ जाते शब्द स्पर्श से बड़े हैं हम भी ये बताते कुछ तो शब्द कहते हम और करीब आ जाते

मटका (पुरूष) और सुराही (स्त्री)

रचना गौड़ भारती कच्ची मिट्टी का घड़ा हो तुम मैं हूं तुम्हारी सुराही भीनी सी खुश्बू तुम में थी सुगंधित जल मैं भर लायी जीवन का लहू जमा हुआ- सा चलो मिलकर इसे पिघलाएं एक कुम्हार (परमात्मा), एक ही मिट्टी, तुम रहे तने, मुझे झुकाया ये कैसी प्रकृति टूटोगे तुम भी, बिखरूंगीं मैं भी काम एक ही है प्यास बुझाना प्यास जो बुझे तो प्यासे, खुदा से दुआ करना मटके से मेरी गर्दन कभी न लम्बी करना वरना ये दुनियां पकड़-पकड़ गिराएगी पानी पीकर खाली सुराही (भोग्यक्ता) जमीन पर लुढ़काएगी

निरक्षर मानव

रचना गौड़ भारती पेड़ के ओखल में कठफोड़वे का घर था वन पेड़ों से बेजोड़ था बीहड़ जंगल, लकड़ियों का खजाना जैसे जीव जन्तुओं से नहीं इसे खुदग़र्ज आदमियों से डर था वहीं हाथों में कुल्हाड़ी लिए कुछ लकड़ी चोरों का भी दल था कठफोड़वे और लोगों को जंगल से बराबरी का आसरा था पहली कुल्हाड़ी की ठेस वृक्ष व कठफोड़वे को एक साथ हिला गई तब कठफोड़वे की निगाह अपनी प्रहारी चोंच के प्रहार पर गई तने को आश्वासित कर वो उन लोगो पे जा टूटा अपने आसरे का सिला एक कठफोड़वे ने ऐसे दिया अब वृक्ष की हर शाखा भी झूम उठी तेज पवन के झौंकों से जैसे निकली ध्वनि, शुक्रिया कह उठी ये पेड़ एक विद्यालय के प्रांगण में था लोग जहां के अशिक्षित पर वृक्ष शिक्षा की तहजीब में था परोपकारिता और शिष्टता का पाठ एक वृक्ष व कठफोड़वा पढ़ गया अफ़सोस इतना ही रहा कि इंसानियत का मानव इससे क्यों निरक्षर रह गया ।

स्त्री-विमर्श के दर्पण में स्त्री का चेहरा

- मूलचन्द सोनकर 4 अब हम इस बात की चर्चा करेंगे कि स्त्रियाँ अपनी इस निर्मित या आरोपित छवि के बारे में क्या राय रखती हैं। इसको जानने के लिए हम उन्हीं ग्रन्थों का परीक्षण करेंगे जिनकी चर्चा हम पीछे कर आये हैं। लेख के दूसरे भाग में वि.का. राजवाडे की पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' के पृष्ठ १२८ से उद्धृत वाक्य को आपने देखा। इसी वाक्य के तारतम्य में ही आगे लिखा है, ‘‘यह नाटक होने के बाद रानी कहती है - महिलाओं, मुझसे कोई भी संभोग नहीं करता। अतएव यह घोड़ा मेरे पास सोता है।....घोड़ा मुझसे संभोग करता है, इसका कारण इतना ही है अन्य कोई भी मुझसे संभोग नहीं करता।....मुझसे कोई पुरुष संभोग नहीं कर रहा है इसलिए मैं घोड़े के पास जाती हूँ।'' इस पर एक तीसरी कहती है - ‘‘तू यह अपना नसीब मान कि तुझे घोड़ा तो मिल गया। तेरी माँ को तो वह भी नहीं मिला।'' ऐसा है संभोग-इच्छा के संताप में जलती एक स्त्री का उद्गार, जिसे राज-पत्नी के मुँह से कहलवाया गया है। इसी पुस्तक के पृष्ठ १२६ पर अंकित यह वाक्य स्त्रियों की कामुक मनोदशा का कितना स्पष्ट विश्लेषण...

स्त्री-विमर्श के दर्पण में स्त्री का चेहरा

- मूलचन्द सोनकर 3 अब आइये, विषय की ओर लौटते हैं। जिस ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' का डंका पीटकर हिन्दू धर्म और संस्कृति पर गर्व करने वाले घोषणा करते हैं कि हमारे धर्म-शास्त्रों में स्त्री को देवी का रूप मानकर उसकी पूजा करने का प्रावधान है, वह इसी मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के छप्पनवें श्लोक की पहली पंक्ति हैं। किसी ने भी यह सोचने की जरूरत नहीं समझा कि जिस मनु स्मृति ने स्त्रियों की अस्मिता को लांछित करने में कोई कोर-कसर बाक़ी न रखा हो उसमें यह श्लोक आया ही क्यों? लेकिन करें क्या, इस श्लोकार्द्ध का अर्थ ऊपर से देखने में इतना सीधा और सरल है कि इसको किसी के मन में कोई संशय ही नहीं पैदा होता। इसके अतिरिक्त यह कारण भी हो सकता है कि अधिकांश लोगों को यह पता ही न हो कि यह किस ग्रन्थ में है वास्तविक अर्थ तक कैसे पहुँचेगे। इस श्लोक को यदि श्लोक संख्या ५४ और ५५ के साथ पढ़ा जाये तो स्पष्ट होगा कि ‘पूजा' का आशय विवाह में दिया जाने वाला स्त्री धन है और मनु ने इससे दहेज प्रथा की शुरुआत की थी। स्त्री-विमर्श के पैरोकारों को चाहिये कि वे इस दुष्टाचार का ...