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ऊहापोह

महेंद्र भटनागर

प्रश्न —
अविकल स्थिर
अपनी जगह पर।
पंगु
सारी तर्कना,
विखण्डित
कल्पना !
अनिश्चित की शिलाओं तले
रोपित प्रश्न !
.
सूत्राभाव
पूर्व...उत्तर...सर्वत्र
ठहराव !
.
यह कश-म-कश
और कब तक ?
विवश मनःस्थिति
और कब तक ?
और कब तक
ओढ़े रहोगे प्रश्न ?
उलझी ऊबट सतह पर।
.
सब पूर्ववत्
अपनी जगह पर।

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अच्‍छी ऊहापोह थी

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