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वाड्मय आदिवासी अंक 9044918670

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उषा प्रियंदा का साहित्य

संतोष गुलाटी का रचना संसार  vangmaya books aligarh 9044918670
लोक संस्कुति और साहित्य vangmaya books 9044918670 aligarh

शानी विशेषांक

शानी विशेषांक भाग-एक व्यक्तित्व एवं कृतित्त्व और उपन्यासों का मूल्यांकन डा. धनंजय वर्मा & शानी की जीवन-रचना यात्रा नासिरा शर्मा &गुलैल चलाने वाला लेखक: शानी मधुरेश &काला जल: एक पुनर्पाठ रोहिताश्व& काला जल: उपेक्षित वर्ग की अंतश्चेतना और शिल्प के सीमांत डा. शिवचंद प्रसाद & काला जल: चाह है पर राह नहीं डा. तारिक असलम &काला जल और सामाजिक यथार्थवाद डा. नीरू &अंधेरी-बंद ज़िन्दगी का महाख्यान: काला जल डा. नग़मा जावेद &काला जल: वेदना की बाज़गश्त मूलचंद सोनकर &काला जल अर्थात् अज़ सर-ए-नौज़िन्दगी हो, गर रिहा हो जाइये ख़ान अहमद फ़ारुख & शानी के काला जल का काले पानी से निकलने का अधूरा वृत्तांत डा. एम. फ़ीरोज़ अहमद & मुस्लिम जीवन का प्रामाणिक दस्तावेज़: काला जल सग़ीर अशरफ़& काला जल एक औपन्यासिक दस्तावेज़ डा. रमाकांत& राय काला जल और हिन्दू-मुस्लिम संबंध डा. अवधबिहारी पाठक& सच का नेपथ्य नहीं होता कभी बनाम काला जल डा. इकरार अहमद& मुस्लिम स्त्रिायों की महागाथा: एक लड़की की डायरी रेयाना परवीन& नदी और सीपियाँ: एक अध...

जने अजीबी नासिरा शर्मा प्रेम कुमार

जने अजीबी नासिरा शर्मा

नासिरा शर्मा का नया उपन्यास पारिजात

वाङ्मय का कुसुम अंसल विशेषांक

भानु चैहान अलीगढ़ हिन्दी में साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में वाङ्मय एक जाना-माना नाम है। सामान्य अंकों के साथ-साथ समय-समय पर निकाले जाने वाले विशेषांकों जैसे- हिन्दी के मुस्लिम कथाकार अंक कबीर अंक साक्षात्कार अंक नारी अंक राही मासूम रज़ा अंक बदीउज्ज़़माँ अंक नासिरा शर्मा अंक आदि ने पत्रिका को विशेष ख्याति दिलाई। इसी क्रम में वाडमय पत्रिका अपने नये अंक-कथाकार कुसुम अंसल विशेषांक लेकर उपस्थिति हुई। कविता कहानी उपन्यास यात्रा वृतांत्त आत्मकथा नाटक निबंध अनुवाद आदि सभी विधाओं में अपनी कुशल रचनाधर्मिता का परिचय कुसुम जी ने दिया है किन्तु फिर भी यह दुखद है कि साहित्यिक जगत में वह स्थान नहीं मिला जिसकी वह अधिकारी हैं इसका कारण उनकी रचनाओं का उचित मूल्यांकन न होना भी हो सकता हैं इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए वाडमय पत्रिका ने कुसुम अंसल विशेषांक में उनके व्यक्तित्व व कृतित्त्व को विभिन्न कोणों से देखते-परखते हुए साहित्यिक जगत का ध्यान आकृष्ट करने और उसके मूल्यांकन का प्रयास किया गया है। विस्तृत फलक पर फैले कुसुम जी के साहित्य को चार भागों - व्यक्तित्व व कृतित्त्व और कविताओं का मूल्यांकन उपन...

kusum ansal ank

अनुसंधान त्रैमासिक वर्ष : २ अंक : ६ अप्रैल-जून २०११ सम्पादक : डॉ. शगुफ्ता नियाज असि. प्रोफेसर हिन्दी, वीमेन्स कॉलेज, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़

राही मासूम रजा के सम्यक् मूल्यांकन का एक सार्थक प्रयास

डॉ. शिवचन्द प्रसाद डॉ. एम. फीरोज+ खान द्वारा सम्पादित ग्रन्थ- ÷राही मासूमः कृतित्व एवं उपलब्धियाँ' प्राख्यात आँचलिक कथाकार, साझी संस्कृति प्रबल उद्गाता, राष्ट्रवाद और अपनी माँटी के सच्चे प्रेमी राही मासूम रज+ा को हर कोण से मूल्यांकित करने का एक सार्थक और यथोचित प्रयास है जिसमें, सम्पादक काफी हद तक सफल भी रहा हैं। जहाँ अब तक समीक्षाएँ आँचलिक, आँचलिकता के घिसे-पिटे सतही मुहावरे तक ही सीमित रही हैं या श्लीलता-अश्लीलता के विवाद को ही सुलझाने में अपनी इतिश्री समझती रही हैं, वहीं यह पुस्तक राही की विश्व दृष्टि और वैचारिकता का सामना करती हुई उनके विभिन्न अन्तरंग पहलूओं को भी प्रकाश में लाती है। इस कार्य में पुस्तक में सम्पादित साक्षात्कार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सहायक की भूमिका निभाते हैं, जिन से यह सिद्ध होता है कि राही का जीवन दुःखों का महाकाव्य और संघर्षों की वीरगाथा है। इस संदर्भ में डॉ. प्रेमकुमार के द्वारा नैयर रज+ा राही, गोपालदास नीरज, शहरयार और क़ाज+ी अब्दुल सत्तार से लिए गये साक्षातकार विशेष उल्लेखनीय है। यद्यपि जिस प्रेमकुमार पर डॉ. नामवर सिंह मुहर लगा चुके हों, उन पर अब कुछ कहना...

नैसर्गिक भाषा में नैसर्गिक चिंतन का उद्गार है-

समीक्षक- डॉ. आजम मेरा मानना है कि कविताओं की पुस्तकें तीन तरह के घर की तरह होती हैं, एक जिनमें प्रवेश द्वार होता है जो निष्कासन द्वार भी साबित हो जाता है, अर्थात् जाइए इधर-उधर देखिए वहीं खड़े -खड़े फिर निकल जाइए। दूसरी तरह की पुस्तक में प्रवेश द्वार से घुस जाइए कुछ आगे बढ़िए तो पता चलता है कि हर जगह बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ हैं और आप पछता कर लौटने के बजाए किस खिड़की से बाहर कूद आते हैं। मगर तीसरी पुस्तक ऐसी होती है जिसमें प्रवेश करने के बाद भले ही एक आध खिड़कियाँ भी दिखाई दें, मगर आगे बढ़ने का आकर्षण आप को आगे बढ़ाता रहता है, अन्ततः आप उस घर के अंत तक पहुँच कर बाहर निकलने के द्वार से ही अपने अंदर बहुत सी प्रशंसाएँ, अनुभूतियाँ लेकर निकलते हैं। ÷÷धूप से रूठी चाँदनी'' ऐसा ही घर है जो आप को प्रारंभ से अंत तक आकर्षण में बांधे रखने में सक्षम है। ÷÷धूप से रूठी चांँदनी'' वास्तव में नैसर्गिक भाषा में नैसर्गिक चिंतन का उद्गार है जो सच के अत्यंत समीप प्रतीत होता है। उन्होंने हर पंक्ति में भाव के पूरे के पूरे संसार को समेट दिया है। शाब्दिक चित्राण ऐसा कि हम स्वयं अपने सामने कविता को एक खाका, ...

तुम चाहो तो

सीमा गुप्ता एक अधूरे गीत का मुखड़ा मात्रा हूँ, तुम चाहो तो छेड़ दो कोई तार सुर का एक मधुर संगीत में मैं ढल जाऊंगा... खामोश लब पे खुश्क मरुस्थल-सा जमा हूँ तुम चाहो तो एक नाजुक स्पर्श का बस दान दे दो एक तरल धार बन मैं फिसल जाऊंगा... भटक रहा बेजान रुह की मनोकामना-सा तुम चाहो तो हर्फ बन जाओ दुआ का ईश्वर के आशीर्वाद-सा मैं फल जाऊंगा... राख बनके अस्थियों की तिल-तिल मिट रहा हँू तुम चाहो तो थाम ऊंगली बस एक दुलार दे दो बन के शिशु मातृत्व की ममता में मैं पल जाऊंगा... चाँद मुझे लौटा दो ना चंदा से झरती झिलमिल रश्मियों के बीच एक अधूरी मखमली सी ख्वाइश का सूनहरा बदन होने से सुलगा दो न इन पलकों में जो ठिठकी है उस सुबह को अपनी आहट से एक बार जरा अलसा दो ना बेचैन उमंगो का दरिया पल-पल अंगड़ाई लेता है आकर फिर सहला दो न छू करके अपनी सासो से मेरे हिस्से का चांद कभी मुझको भी लौटा दो ना मौन करवट बदलता नहीं शब्द कोई गीत बनकर अधरों पे मचलता नहीं सुर सरगम का साज कोई जाने क्यूँ बजता नहीं... बाँध विचलित सब्र के हिचकियो...

मुझे जन्म लेने दो

नग़मा जावेद माँ! पिताजी कहते हैं। उन्हें लड़की नहीं चाहिए। तुम डरी-डरी सी जी रही हो.... अगर पैदा हुई लड़की तो क्या होंगा? माँ! मत डरो- मुझे जन्म लेने दो मैं- अपनी लड़ाई खुद लडूँगी।