Sunday, November 30, 2008

आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....

VIJAY KUMAR SAPPATTI


आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....
कुछ याद दिला गया , कुछ भुला दिया ,
मुझको ; मेरे शहर ने रुला दिया.....

यहाँ की हवा की महक ने बीते बरस याद दिलाये
इसकी खुली ज़मीं ने कुछ गलियों की याद दिलायी....
यहीं पहली साँस लिया था मैंने ,
यहीं पर पहला कदम रखा था मैंने ...
इसी शहर ने जिन्दगी में दौड़ना सिखाया था.
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....

दूर से आती हुई माँ की प्यारी सी आवाज ,
पिताजी की पुकार और भाई बहनो के अंदाज..
यहीं मैंने अपनों का प्यार देखा था मैंने...
यहीं मैंने परायों का दुलार देख था मैंने .....
कभी हँसना और कभी रोना भी आया था यहीं , मुझे
आज मेरे शहर ने मुझे रुला दिया.....

ये जो हो रहा है !!

RAJEEV THEPRA


जो हो रहा है उसे समझ,ख़ुद को समझाने दे ,
चुप मत बैठ आदम ,दिल को तिलमिलाने दे!!
अपने या घर-दूकान के भीतर घुसा मत रहा,
बाहर निकल,ताज़ी हवा को भी पास आने दे!!
कोई भी किसी को जीने क्यूँ नहीं दे रहा ,
ख़ुद को कभी उनसे ये बात कर के आने दे !!
तेरे कूच करने से ही बदल पाएगी ये फिजां ,
तू अपनी मुहब्बत से जरा इसे बदलवाने दे !!
जन्नत एक तिलिस्म नहीं है मेरे भाई,सच,
मेरे साथ चल,प्रेम के गली में हो के आने दे !!
तू अपनी सोच में अच्छा हो के बैठा मत रह,
तू अपने अच्छे कर्मों को यां खिलखिलाने दे !!
तेरे रहते ही कुछ अच्छा हो,तो हो जाए"गाफिल",
वरना इस बेमुरौवत जिंदगी का क्या,जाने दे !!

Saturday, November 29, 2008

प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर !

महादेवी वर्मा

प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर !
दुख से आविल सुख से पंकिल,
बुदबुद् से स्वप्नों से फेनिल,
बहता है युग-युग अधीर !

जीवन-पथ का दुर्गमतम तल
अपनी गति से कर सजग सरल,
शीतल करता युग तृषित तीर !
इसमें उपजा यह नीरज सित,

कोमल कोमल लज्जित मीलित;
सौरभ सी लेकर मधुर पीर !
इसमें न पंक का चिह्न शेष,
इसमें न ठहरता सलिल-लेश,

इसको न जगाती मधुप-भोर !
तेरे करुणा-कण से विलसित,
हो तेरी चितवन में विकसित,
छू तेरी श्वासों का समीर !

तस्वीर

VIJAY KUMAR SAPPATTI




मैंने चाहा कि
तेरी तस्वीर बना लूँ इस दुनिया के लिए,
क्योंकि मुझमें तो है तू ,हमेशा के लिए....

पर तस्वीर बनाने का साजो समान नही था मेरे पास.
फिर मैं ढुढ्ने निकला ; वह सारा समान , ज़िंदगी के बाज़ार में...

बहुत ढूंढा , पर कहीं नही मिला; फिर किसी मोड़ पर किसी दरवेश ने कहा,
आगे है कुछ मोड़ ,तुम्हारी उम्र के ,
उन्हें पार कर लो....
वहाँ एक अंधे फकीर कि मोहब्बत की दूकान है;
वहाँ ,मुझे प्यार कर हर समान मिल जायेगा..




मैंने वो मोड़ पार किए ,सिर्फ़ तेरी यादों के सहारे !!
वहाँ वो अँधा फकीर खड़ा था ,
मोहब्बत का समान बेच रहा था..
मुझ जैसे,
तुझ जैसे,
कई लोग थे वहाँ अपने अपने यादों के सलीबों और सायों के साथ....
लोग हर तरह के मौसम को सहते वहाँ खड़े थे.
उस फकीर की मरजी का इंतज़ार कर रहे थे....
फकीर बड़ा अलमस्त था...
खुदा का नेक बन्दा था...
अँधा था......

मैंने पूछा तो पता चला कि
मोहब्बत ने उसे अँधा कर दिया है !!
या अल्लाह ! क्या मोहब्बत इतनी बुरी होती है..
मैं भी किस दुनिया में भटक रहा था..
खैर ; जब मेरी बारी आई
तो ,उस अंधे फकीर ने ,
तेरा नाम लिया ,और मुझे चौंका दिया ,
मुझसे कुछ नही लिया.. और
तस्वीर बनाने का साजो समान दिया...
सच... कैसे कैसे जादू होते है जिंदगी के बाजारों में !!!!

मैं अपने सपनो के घर आया ..
तेरी तस्वीर बनाने की कोशिश की ,
पर खुदा जाने क्यों... तेरी तस्वीर न बन पाई.
कागज़ पर कागज़ ख़त्म होते गए ...
उम्र के साल दर साल गुजरते गये...
पूरी उम्र गुजर गई
पर
तेरी तस्वीर न बनी ,
उसे न बनना था ,इस दुनिया के लिए ....न बनी !!

जब मौत आई तो , मैंने कहा ,दो घड़ी रुक जा ;
वक्त का एक आखरी कागज़ बचा है ..उस पर मैं "उसकी" तस्वीर बना लूँ !
मौत ने हँसते हुए उस कागज़ पर ,
तेरा और मेरा नाम लिख दिया ;
और मुझे अपने आगोश में ले लिया .
उसने उस कागज़ को मेरे जनाजे पर रख दिया ,
और मुझे दुनियावालों ने फूंक दिया.
और फिर..
इस दुनिया से एक और मोहब्बत की रूह फना हो गई..

Thursday, November 27, 2008

कविता

इला प्रसाद

अँधेरे और उदासी की बात करना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
निराशा और पराजय का साथ करना
मुझे अच्छा नहीं लगता,
इसलिए यात्रा में हूँ।
अँधेरे में उजाला भरने
और पराजय को जय में बदलने के लिए
चल रही हूँ लगातार...

Wednesday, November 26, 2008

जिज्ञासा

अशोक चक्रधर

कितनी रोटी
गाँव में अकाल था,
बुरा हाल था।
एक बुढ़ऊ ने
समय बिताने को,
यों ही पूछा
मन बहलाने को-
ख़ाली पेट पर
कितनी रोटी खा सकते हो
गंगानाथ ?
गंगानाथ बोला-
सात !
बुढ़ऊ बोला-
ग़लत !
बिलकुल ग़लत कहा,
पहली रोटी
खाने के बाद
पेट ख़ाली कहाँ रहा।
गंगानाथ,
यही तो मलाल है,
इस समय तो
सिर्फ़ एक रोटी का सवाल है।

कब्र

VIJAY KUMAR SAPPATTI



जब तुम ज़िन्दगी की टेड़ी-मेढ़ी
और उदास राहों पर
चलकर ,थककर
किसी अपने की तलाश करने लगो ,
तो एक पुरानी ,जानी पहचानी राह पर चली जाना

ये थोडी सी आसान सी राह है
इसमे भी दुःख है ,दर्द है ;
पर ये थकाने वाली राह नही है ..
ये मोहब्बत की राह है !!!

जहाँ ये रास्ता ख़त्म होंगा ,
वहां तुम्हे एक कब्र मिलेंगी ;
उस कब्र के पत्थर अब उखड़ने लगे है
कब्र से एक झाड़ उग आया है ,
पहले इसमे फूल उगते थे ,अब कांटो से भरा पड़ा है..
कब्र पर कोई अपना ,कई दिन पहले
कुछ मोमबत्तियां जला कर छोड़ गया था ..
जिसे वक्त की आँधियों ने बुझा दिया था..
अब पिघली हुई मोम आंसुओं की
शक्लें लिए कब्र पर पड़ी है
काश , कोई उस कब्र को सवांरने वाला होता ..
पर मोहब्बत की कब्रों के साथ
ज़माना ऐसा ही सलुख करता है ..

कुछ फूल आस-पास बिखरे पड़े है
वो सब सुख चुके है
पर अब भी चांदनी रातों में उनसे खुशबू आती है ,

चारो तरफ़ बड़ी वीरानी है ..
तुम उस कब्र के पास चली आना
अपने आँचल से उसे साफ़ कर देना
अपने आंसुओं से उसे धो देना
फिर अपने नर्म लबों से
उसके सिरहाने को चूम लेना

वो मेरी कब्र है !!!

वहां तुम्हे सकून मिलेंगा
वहां तुम्हे एहसास होंगा
कि मोहब्बत हमेशा जिंदा रहती है ..!!

मेरी कब्र पर जब तुम अओंगी ,
तो , वहां कि मनहूसियत
थोड़े वक्त के लिए चली जायेंगी
कुछ यादें ताज़ा हो जायेंगी ..!!

जब कुछ और सन्नाटा गहरा जायेगा
तब, तुम्हे एक आवाज सुनाई देंगी
तुम्हे मेरी आह सुनाई देंगी ;
क्योकि मेरी वो कब्र
तुमने ही तो बनाई है !!!!

तुम्हे याद आयेगा कि
कैसे तुमने मेरा ज़नाजा
वहां दफनाया था ...!!

वक्त बड़ा बेरहम है ......

जब तुम वापस लौटोंगी
तो , मेरी आँखें ,तुम्हे ..
दूर तलक जातें हुए देखेंगी ....!

तुम;
फिर कब अओंगी मेरी कब्र पर !!!!!!!

Tuesday, November 25, 2008

तू

VIJAY KUMAR SAPPATTI


मैं अक्सर सोचती हूँ
कि,
खुदा ने मेरे सपनो को छोटा क्यों बनाया
करवट बदलती हूँ तो
तेरी मुस्कारती हुई आँखे नज़र आती है
तेरी होटों की शरारत याद आती है
तेरे बाजुओ की पनाह पुकारती है
तेरी नाख़तम बातों की गूँज सुनाई देती है
तेरी क़समें ,तेरे वादें ,तेरे सपने ,तेरी हकीक़त ..
तेरे जिस्म की खुशबु ,तेरा आना , तेरा जाना ..
एक करवट बदली तो ,
तू यहाँ नही था..
तू कहाँ चला गया..
खुदाया !!!!
ये आज कौन पराया मेरे पास लेटा है...

Monday, November 24, 2008

जिन्दगी है मेरे साथी-मरने की कला

धर्मवीर भारती



न शान्ति के लिए मचल
जल निशा प्रदीप जल !
जल कि काली मौत वाली रात को जला !
जल कि खुद परवाना बनकर सूरज तुझ पर मँडराये
तेरी एक जलन में विहँसें सौ विहान उज्ज्वल !
जल शिक्षा प्रदीप जल !!
जिन्दगी की रात में मत प्रेत बन कर घूम
पतझड़ों में झूम
पीली-पीली पत्तियों के मुर्दा होठ चूम
धीमे से उन पर उढ़ा दे मौत का झीना कफ़न
किन्तु फिर उन पर सिसक कर मत तू मिट जा धूल में
जल उठ खिल उठ मेरे दीपक, जिन्दगी के फूल में
इस दुनिया की डालियों में इन घुटती आँधी मालियों में
बन बसन्ती आग तू सुलगा दे जलती कोपलें
जिन्दगी की कोपलें
जिन्दगी है मेरे साथी-मरने की कला !
जल कि काली मौत वाली रात को जला !!!

सुलगती तनहाई

सीमा गुप्ता

बिलबिला के इस दर्द से,

किस पनाह मे निजात पाऊं...

तुने वसीयत मे जो दिए,

कुछ रुसवा लम्हे,

सुलगती तनहाई ,

जख्मो के सुर्ख नगीने...

इस खजाने को कहाँ छुपाऊं ...

अरमानो के बाँध किरकिराए,

अश्कों के काफिले साथ हुए,

किस बंजर भूमि पर बरसाऊ ...

जेहन मे बिखरी सनसनी,
रूह पे फैला सन्नाटा ,

संभावना की टूटती कडियाँ ,

किस ओक मे समेटूं , कहाँ सजाऊ...

Sunday, November 23, 2008

मौनता

VIJAY KUMAR SAPPATTI


मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
जिसे सब समझ सके , ऐसी परिभाषा देना ;
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना.

मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
ताकि ,मैं अपने शब्दों को एकत्रित कर सकूँ
अपने मौन आक्रोश को निशांत दे सकूँ,
मेरी कविता स्वीकार कर मुझमे प्राण फूँक देना
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,

मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
ताकि मैं अपनी अभिव्यक्ति को जता सकूँ
इस जग को अपनी उपस्तिथि के बारे में बता सकूँ
मेरी इस अन्तिम उद्ध्ङ्तां को क्षमा कर देना
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,

मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
ताकि ,मैं अपना प्रणय निवेदन कर सकूँ
अपनी प्रिये को समर्पित , अपना अंतर्मन कर सकूँ
मेरे नीरस जीवन में आशा का संचार कर देना
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,

मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,
ताकि ,मैं मुझमे जीवन की अनुभूति कर सकूँ
स्वंय को अन्तिम दिशा में चलने पर बाध्य कर सकूँ
मेरे गूंगे स्वरों को एक मौन राग दे देना
मेरी मौनता को एक अंजानी भाषा देना ,

कितने पाकिस्तान

सारांश:
कमलेश्वर का यह उपन्यास मानवता के दरवाजे पर इतिहास और समय की एक दस्तक है...इस उम्मीद के साथ कि भारत ही नहीं, दुनिया भर में एक के बाद दूसरे पाकिस्तान बनाने की लहू से लथपथ यह परम्परा अब खत्म हो....।

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश
यह उपन्यास

यह उपन्यास मन के भीतर लगातार चलने वाली एक जिरह का नतीजा है। दशकों तक सभी कुछ चलता रहा। मैं कहानियाँ और कॉलम लिखता रहा। नौकरियाँ करता और छोड़ता रहा। टी.वी. के लिए कश्मीर के आतंकवाद और अयोध्या की बाबरी मस्जिद विवाद पर दसियों फ़िल्में बनाता रहा। सामाजिक हालात ने कचोटा तो शालिनी अग्निकांड पर ‘जलता सवाल’ और कानपुर की बहनों के आत्महत्याकांड पर ‘बन्द फाइल’ जैसे कार्यक्रम बनाने में उलझा रहा। इस बीच एकाध फ़िल्में भी लिखीं। चंद्रक्रांता, युग, बेताल, विराट जैसे लम्बे धारावाहिकों के लेखन में लगा रहा।इसी बीच भारतीय कृषि के इतिहास पर एक लम्बा श्रृंखलाबद्ध धारावाहिक लिखने का मौका मिला। कई सभ्यताओं के इतिहास और विकास की कथाओं को पढ़ते-पढ़ते चश्मे का नम्बर बदला। एक-एक घंटे की 27 कड़ियों को लिखते-लिखते बार-बार दिमाग आदिकाल और आर्यों के आगमन को लेकर सोचता रहा। बुद्धि और मन का सच मोहनजोदड़ो-हड़प्पा सभ्यता और आर्यों के बीच स्थापित किए गए ‘संघर्ष-सिद्धांत’ को स्वीकार करने से विद्रोह करता रहा। उस एपीसोड को मैंने कई बार लिखा। एक बार तो मैंने ऊब कर काम, निपटाने की नीयत से पश्चिमी विद्वानों के ‘आर्य-आक्रमण’ के सिद्धान्त को स्वीकार करके वह अंश लिख डाला। फिर लोकमान्य तिलक की इस थ्यौरी और उद्भावना से भी उलझता रहा कि आर्य भारत के मूल निवासी थे। मैंने इस उद्भावना को लेकर वह अंश फिर लिखा; लिखने के बाद भी मन निर्भ्रान्त नहीं हुआ। लगा यही कि यह बात भी रचना के सम्भावित सत्य तक नहीं पहुँचाती। सच को यदि पहले से सोचकर मान्य बना लिया जाए तो वह सत्याभास तो दे सकता है, पर आन्तरिक सहमति तक नहीं पहुँचाता। शायद, तब, रचना अपने सम्भावित सत्य को खुद तलाशती है। उसी तलाश ने मुझे यह बताया कि आर्यों के आक्रमण होने के कोई कारण नहीं थे। वे आक्रांता नहीं थे। वे आर्य आदिम कृषि से परिचित खानाबदोश कबीले थे, जो सहनशील प्रकृति और सृजनगर्भा धरती की तलाश में निकले थे। सिन्धु घाटी में सहनशीला प्रकृति तो थी ही, सृजनगर्भा धरती की भी कमी नहीं थी। इसलिए आक्रमण या युद्ध की ज़रूरत नहीं थी। आर्य आए और इधर-उधर बस गए होंगे।वेदों में असुरों से युद्धों की जो अनुगूंज मिलती है, वह निश्चय ही सत्ता, समाज, वैभव और जीवन-पद्धति के स्थिरीकरण के बाद की उपरान्तिक गाथा है। दुनिया की सभ्यताओं के इतिहास में, किसी आक्रांता जाति समुदाय ने वेदों जैसे रचनात्मक ग्रन्थों के लिखे जाने का कोई प्रमाण नहीं दिया है। ऐसे ग्रंथ शांति, धीरज और आस्था के दौर में ही लिखे जा सकते हैं, युद्धों के दौर में नहीं। रचना के इस संभावित सत्य ने मुझे सांत्वना दी। तब ‘कृषि-कथा’ का लेखन हो सका।इन और ऐसी तमाम रचनाओं, विचारों, इतिहास की सैकड़ों सृजनात्मक दस्तकों और व्यवधानों के बीच रुक-रुक कर ‘कितने पाकिस्तान’ का लिखा जाना चलता रहा। उन तमाम विधाओं की तकनीकी सृजनात्मकता का लाभ भी मुझे मिलता रहा। शब्द-स्फीति पर अंकुश लगा रहा।इसे मैंने मई, सन् 1990 में लिखना शुरू किया था। घने जंगल के बीच देहरादून के झाजरा वन विश्राम गृह में सुभाष पंत ने व्यवस्था करा दी थी। रसद वगैरह नीचे से लानी पड़ती थी। गायत्री साथ थी ही। साथ में हम अपने 4 बरस के नाती अनंत को भी ले गए थे। एक कुत्ता वहाँ आता था, उससे अनंत ने दोस्ती कर ली थी। उसका नाम मोती रख लिया था। कभी-कभी वहां बहुंरगी जंगली मुर्गे भी आते थे। अनंत उन्हें देखने के लिए दूर तक चला जाता था।जंगल की पगडंडियों से यदा-कदा लकड़हारे आदिवासी गुज़रते रहते थे। एक दिन अनंत मुर्गों का पीछा करते-करते गया तो नजर से ओझल हो गया। गायत्री बहुत ज्यादा चिंतित हो गई। तलाशा, आवाजें लगाईं, घबरा के इधर-उधर दौड़े-भागे पर अनंत का कहीं कोई पता नहीं चला। तभी एक गुजरते बूढ़े ने बताया कि उसने जंगल में कुछ दूर पर एक छोटे बच्चे को लकड़हारे के साथ जाते देखा था...यह सुनकर गायत्री तो अशुभ आशंका और भय से लगभग मूर्छित ही हो गई। आदिम कबीलों की नरबलि वाली परम्परा की पठित जानकारी ने गायत्री को त्रस्त कर दिया था। आशंकाओं से ग्रस्त मैं भी था। मैं गायत्री को संभाल कर, पानी पिला कर, उसे नौकर के हवाले करके फौरन निकला। बूढ़े ने जिधर बताया था, उधर वाली पगडंडी पर उतर कर तेजी से चला, तो कुछ दूर पर देखा-एक लकड़हारे के कन्धों पर पैर सामने लटकाए उसकी पगड़ी पर बाँहें बाँधे, किलकारी मारता अनंत बैठा था। लकड़हारे के बायें हाथ में कुल्हाड़ी थी, और वह उसे लिए हुए सामने से चला आ रहा था। जान में जान आई। पता चला, वह अनंत को हिरन और भालू दिखाने ले गया था।इस घटना ने मुझे आदिम कबीलेवालों को जानने, पहचानने और उनके बारे में पठित तथ्यों से अलग अनुभवजन्य एक और ही सोच दी थी। सात-आठ बरस बाद अनुभव के इसी अंश ने मेरा साथ तब दिया जब मैं उपन्यास में माया सभ्यता के प्रकरण से गुज़र रहा था। बहरहाल...मेरी दो मजबूरियाँ भी इसके लेखन से जुड़ी हैं। एक तो यह कि कोई नायक या महानायक सामने नहीं था, इसलिए मुझे समय को ही नायक-महानायक और खलनायक बनाना पड़ा।और दूसरी मजबूरी यह कि इसे लिखते समय लगातार यह एहसास बना रहा कि जैसे यह मेरी पहली रचना हो...लगभग उसी अनकही बेचैनी और अपनी असमर्थता के बोध से मैं गुज़रता रहा..आखिर इस उपन्यास को कहीं तो रुकना था। रुक गया। पर मन की जिरह अभी भी जारी है...
-कमलेश्वर

Saturday, November 22, 2008

मोहब्बत की सांसों की

सीमा गुप्ता

अंधियारे की चादर पे,
छिटकी कोरी चांदनी ..
सन्नाटे मे दिल की धडकन ,
मर्म मे डूबे सितारों का
न्रत्य और ग़ज़ल...
झुलसती ख्वाइशों की
मुंदती हुई पलक ..
मोहब्बत की सांसों की,
आखरी नाकाम हलचल..
पिघलते ह्रदय का
करुण खामोश रुदन..
ये सब तुम्हारी बाट मे,
इक हिचकी बन अटके हैं..
अगर एक पल को तुम आते
इन सब को सांसों के कर्ज से...
निज़ात दिला जाते...

Friday, November 21, 2008

जिन्दगी की आस में लुटती यहाँ है जिन्दगी

धर्मवीर भारती

इस दुनिया के कणकणों में बिखरी मेरी दास्तां
इस दुनिया के पत्थरों पर अंकित मेरा रास्ता
फिर भला क्यों जाना चाहूँगा माझी उस पार मैं !!
माना मैंने उस तरफ हरियाले कोमल फूल हैं
माना मैंने उस तरफ लहरों में बिखरे फूल हैं
माना मैंने इस तरफ बस कंकड़ पत्थर धूल हैं
किन्तु फिर क्या पत्थरों पर सर पटकता ही रहूँ !
खींच कर यदि ला सकूँ उस पार को इस पार मैं
फिर भला क्यों जाना चाहूँगा माझी उस पार मैं !!
पैरों में भूकम्प मेरी साँसों में तूफान है
स्वर लहरियों में मेरी हँसते प्रलय के गान हैं
मौत ही जब आज मेरी जिन्दगी का मान है
फिर दबा लूँ क्यों न दोनों मुट्ठियों में कूल को
बह चलूँ खुद क्यों न बन जलधार मैं
फिर भला क्यों जाना चाहूँगा माझी उस पार मैं !!
जिन्दगी की आस में लुटती यहाँ है जिन्दगी
जिन्दगी की आस में घुटती यहाँ है जिन्दगी
किन्तु फिर क्या बैठकर आकाश को ताका करूँ
तोड़ कर यदि ला सकूँ आकाश को इक बार मैं
फिर भला क्यों जाना चाहूँगा माझी उस पार मैं !!!

Thursday, November 20, 2008

भरोसे से

सीमा गुप्ता

वक्त के जंगल के ये झंखाड़,
और वो झाड़ियाँसाफ़ दिखने में ख़लल डालें,
जो बनकर गुत्थियाँचंद क़दमों पर नज़र आएँगे,
फिर से हम ज़रूरबस भरोसे से हटाना है,
तुम्हें बेज़ारियाँ.........
(बेज़ारियाँ = विमुखता, क्रोध, नाख़ुशी)

यह गुलाम देश है

धर्मवीर भारती

गुलाब मत यहाँ बिखर
पराग मत यहाँ बिखर
यह गुलाम देश है !
ये दास भावना
ये गीले-गीले गीत औ’ उदास कल्पना
हैं यही गुलाम देश की निशानियाँ
बेहयाई का महज यहाँ गुजर बसर !
यह गुलाम देश है !
ये सूने-सूने गाँव
ये भूखे-सूखे पंजरों के लड़खड़ाते पाँव
ये नहीं है जिन्दगी ये मौत की छाँव
आदमी यहाँ पिये हैं मौत का ज़हर
ये गुलाम देश हैं।
तू बन यहाँ प्रसून
तेज कण्टकों का आज काम है यहाँ
टूटने से पहले चुभ कर चूस ले दो बूँद खून
है यहाँ रहम गुनाह भूल कर रहम न कर !
यह गुलाम देश है !!

Tuesday, November 18, 2008

ये प्यासे-प्यासे होठ ठण्डी आह मेरे साथियो,

धर्मवीर भारती
ये प्यासे-प्यासे होठ ठण्डी आह मेरे साथियो,
ये नहीं है जिन्दगी की राह मेरे साथियों !
आस्मान चीरकर
उतर पड़ो जमीन पर
तुम प्रलय की धार बन कर बन्धनों को तोड़ दो
बह चले फिर जिन्दगी की धार मेरे साथियों !
नाश है निर्माण का सिंगार मेरे साथियों !!
रूप के उभार से
रंग के निखार से
कण्टकों की छोटी-छोटी जालियों को तोड़ दो
छोटे-छोटे बन्धनों के पार मेरे साथियों !
जिन्दगी का हर नया उभार मेरे साथियों !!
प्यास हो अगर लगी
प्यास हो अगर जगी
तो एक पाँव से दबा के आस्मां निचोड़ दो
जिन्दगी है मौत का सवाल मेरे साथियों !
जिन्दगी की रेत खूँ से लाल मेरे साथियों !!

Monday, November 17, 2008

कुंती का लाल

हस्सान अहमद


वो बच्चा अब भी रोता है
जिसे कुंती ने जन्मा था
मगर दुनिया के डर से
उसको दरिया में बहा आयी
तो एक उम्मीद थी उसको
कि शायद रहम दिल कोई
उठाकर अपने दामन में
उसे पालेगा पोसेगा
मगर अफसोस ऐ दुनिया
न कोई उसका वारिस है
न कोई ग़म गुसार उसका
जरा तुम आंख तो खोलो
कि तुम भी देख सकती हो
वह बच्चा अब भी रोता है
किसी फुटपाथ पर बैठा

Friday, November 14, 2008

रश्क

हस्सान अहमद आज़मी

सारे दिन का थका हारा सूरज भी अब
धीरे-धीरे रवां अपने घर की तरफ
मुंतज़िर अपनी दहलीज़ से
एक दिल कश-सी मुस्कान पाने को है
सारा दर्द और ग़म भूल जाने को है

Saturday, November 8, 2008

भ्रम

सीमा गुप्ता

कल्पना की सतह पर आकर थमा,
अनजान सा किसका चेहरा है.....
शब्जाल से बुनकर बेजुबान सा नाम,
क्यूँ लबों पे आकर ठहरा है....
एहसास के अंगारे फ़िर जलने लगे,
उदासी की चांदनी ने किया घुप अँधेरा है....
क्षतिज के पार तक नज़र दौड़ आई,
किसके आभास का छाया कोहरा है......
वक्त की देहलीज पर आस गली,
कितना बेहरम दर्द का पहरा है.....
साँस थम थम कर चीत्कार कर रही,
कोई नही.. कोई नही ..ये भ्रम बस तेरा है.....

खामोश सी रात

SEEMA GUPTA

सांवली कुछ खामोश सी रात,
सन्नाटे की चादर मे लिपटी,
उनींदी आँखों मे कुछ साये लिए,
ये कैसी शिरकत किए चली जाती है....
बिखरे पलों की सरगोशियाँ ,
तनहाई मे एक शोर की तरह,
करवट करवट दर्द दिए चली जाती है....
कुछ अधूरे लफ्जों की किरचें,
सूखे अधरों पे मचल कर,
लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है...
सांवली कुछ खामोश सी रात अक्सर...

'खुदा की वापसी'

नासिरा शर्मा
प्रतिष्ठित हिन्दी-कथाकार नासिरा शर्मा के इस नये?कहना संग्रह 'खुदा की वापसी' को दो अर्थों में लिया जा सकता है - एक तो यही कि यह सोच अब जा चुकी है कि पति एक दुनियावी खुदा है और उसके आगे नतमस्तक होना पत्नी का परम ध्म है, और दूसरा है उस खुदा की वापसी, जिसने सभी न्सानों को बराबर माना और औरत मर्द को समान अधिकार दिये हैं। संग्रह की कहानियों में ऐसे सवालों के इशारे भी हैं जो हमें उपलब्ध हैं उसे भूल कर हम उन मुद्दों के लिए क्यों लड़ते हैं जिन्हों ध्म, कानून, समाज, परिवार ने हमें नहीं दिया हैं? जो अधिकार हमें मिला है जब उसी को हम अपनी जिन्दगी में शामिल नहीं कर पाते और उसके बारे में लापरवाह रहते हैं, तब किस अधिकार और स्वत्त्रता की अपेक्षा हम खुद से करते हैं? दरअसल 'खुदा की वापसी' की सभी कहानियाँ उन बुनियादी अधिकारों की मांग करती नज़र आती हैं जो वासातव में महिलाओं को मिले हुए हैं मगर पुरुष-समाज के धर्म-पंडित-मौलवी मौलिक अधिकारों को भी देने के विरुद्ध हैं।'खुदा की वापसी की कहानियाँ ' एक समुदाय विशेष की होकर भी विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करती हैं। नारी के संघर्षों और उत्पीड़नों से उपजी विद्रूपताओं तथा अर्थहीन सामाजिक रूढ़ाचार पर तीखी चोट करती ये कहानियाँ समकालीन परिवेश और जीवन की विसंगतियों का प्रखर विश्लेषण भी करती हैं, भाषा और शिल्प के नयेपन सहित, पूरी समझदारी और ईमानदारी?के साथ।

निवेदन

कहानी ‘ख़ुदा की वापसी’ लिखते हुए मुझे कई तरह के खौफ ने घेर रखा था। जब हर तरफ धर्म का प्रचार किया जा रहा हो, उस समय मेरी यह कहानी कहीं उसी का गान न समझ ली जाए और उसमें छिपी जिन्दगी की पीड़ा पाठकों के मन को छू न सके, इस खौफ के बावजूद मैं खतरा मोल लेने को तैयार थी। क्योंकि मुझे शिद्दत से महससू हो रहा था कि हमने काफी समय उन अधिकारों को पाने के संघर्ष में गँवा दिया, जिसके लिए हमारा समाज, धर्म और मानसिकता तैयार नहीं थे, मगर हमने उन अधिकारों की तरफ ध्यान नहीं दिया जो हमें मिले हुए हैं और हम उनसे बेखबर सिर्फ इसलिए हैं कि पुरुषप्रधान समाज उसे हमें देना नहीं चाहता है। मुझे लगा, बेहतर है कि हम मिले अधिककारों को पहले हासिल करें, फिर जो नहीं हैं उनका सवाल उठाएँ।दूसरा खतरा मुझे उन कठमुल्ला सियासतदानों से था जो सच की परदाकुशाई से भड़ककर कोई फतवा न दे बैठें। इसलिए मैंने खुदा की वापसी के दोनों मौलवी किरदारों को बिलकुल उसी तरह पेश किया जैसे कि वे हैं। उनसे मैंने पूछ लिया था कि क्या वह मेरी कहानी के ‘पात्र’ बनना पसन्द करेंगे और किसी भी परेशानी के समय बआवाज बुलन्द औरत के अधिकारों की हिमायत करेंगे ? दोनों बखुशी राजी हुए और मुझे यह लिखते हुए खुशी हो रही है कि वह कहानी न केवल पसन्द की गयी बल्कि हजारों औरतों के अहसास की जबान बनी; क्योंकि उस कहानी में मेरा सबसे अहम सवाल था कि लड़की को उन बातों की तालीम क्यों नहीं दी जाती है जिस पर उसकी जिन्दगी के महत्त्वपूर्ण मुद्दे टिके हुए हैं। (जब फरजाना की तरह मुसीबत में पड़ती है तो धर्म-ग्रन्थों को पलटती है)। यदि औरत को अपनी लड़ाई खुद लड़नी है तो फिर अपने लिए बनाये शरीयत कानून का पूरा ज्ञान और देश के अन्य धर्म-कानूनों को भी जानना जरूरी है, तभी वह अपनी लड़ाई लड़ सकती है और एक-दूसरे की मदद कर सकती है वरना दूसरों के भरोसे रही तो उसको वही मिलेगा जो दूसरे उसे देना चाहेंगे। पूरी दुनिया में अनेक औरतें अपनी-अपनी तरह से यह लड़ाई लड़ रही हैं। उनके द्वारा किये गये सर्वे की रिपोर्ट पढ़ने से पता चलता है कि शरीयत के नाम पर कैसे-कैसे जुल्म ढाकर औरतों को उनके अधिकारों से वंचित किया जाता है। इस्लाम ने यदि औरतों को बराबरी का अधिकार दे रखा है तो फिर वह अपने समाज, परिवार में इस तरह कैद क्यों रखी जाती हैं ? एक तरफ कयामत के दिन मुरदों की पहचान माँ के नाम से होगी बाप के वंशवृक्ष से नहीं, फिर उसी औरत को आखिर प्रताड़ित कौन कर रहा है-रियासत, समाज, अज्ञानता ? जवाब साफ है कि वह मर्द है जो औरत के अधिकार का हनन करता है। मगर क्या औरत कम कसूरवार है जो अपने अधिकारों को लेना नहीं जानती है, उसको समझती नहीं है, उसको पढ़ती और दूसरी औरत को बताती नहीं है ?इन कहानियों को लिखने के पीछे केवल आक्रोश नहीं बल्कि मेरी एक मानसिकता भी है, जो मेरे गहरे सन्ताप को इंगित करती है, जो मेरे अन्दर बचपन से एक खौफ की शक्ल में घर कर गया था, जिसने मुझे धार्मिक अनुष्ठानों से दूर रखा; क्योंकि मेरे लिए धर्म का अर्थ था फसाद, घुटन, जड़ता आडम्बर और कठमुल्लापन। खौफ जो मेरे अन्दर परत-दर-परत जमता जा रहा था, वह बगावत की शक्ल में हर बन्धन को तोड़ने पर उकसाता रहता था। इसके बावजूद कि मेरे संस्कार उस परिवार के थे जो शिया और सय्यद था, जहाँ कबला की त्रासदी उनकी सोच का अहम हिस्सा थी, जहाँ जून की तपती दोपहर में ठण्डा पानी पीते हुए ‘मौला तेरी प्यास के सदके’ जैसे जुमले आम थे। मोहर्रम से चहल्लुम तक पूरे दो माह हक की लड़ाई में शहीद हुसैन के सोग में काला कपड़ा पहन अमामबाड़े के सामने नौहा, मरसिया, सोज हदीस, पढ़ना जिन्दगी का हिस्सा था। उसमें सौन्दर्यबोध था, साहित्य था, लय और संगीत था। रंग और दस्तकारी थी, हुनर और सृजन था, तिलिस्म और दर्शन था। गर्जकि इतिहास का यह काल-खण्ड कहीं आपको अभिभूत किये रहता था। दो माह के इस हसीन प्रदर्शन के बाद सब-कुछ बदल जाता था। वह ओज और ऊँचाई कहीं खो जाती थी फिर वही मामूली समस्याएँ थीं, वहीं घटियापन। सब हुसैन की कुर्बानी को भूलकर नेकी करना, दूसरों के लिए बलिदान करना भूल जाते थे। यह विरोधाभास ऐसा था जिसने मेरे इस विश्वास को पुख्ता कर दिया कि यदि मुझे इन्सान बने रहना है तो मुझे धर्म से दूर रहना होगा और किसी भी ख़ुदा के आगे सिजदा नहीं करना होगा। मेरे अपने अनुभव और फैसले से अलग एक पूरा देश है, जिसकी अस्सी प्रतिशत जनता का विश्वास धर्म और पवित्र ग्रन्थों में है। शाहबानों के केस में हम देख चुके थे कि आम आदमी को हमारी हमदर्दी, हमारा संघर्ष, हमारी लड़ाई कहीं प्रभावित नहीं कर पायी जितना मौलवियों के वक्तव्य। और वहीं पर महसूस हुआ था कि हम आम आदमी से बहुत दूर हैं। बौद्धिक स्तर पर हम उनके लिए जितने भी बेचैन हों, मगर वास्तविकता यह है कि हमारे बीच कोई संवाद नहीं है। इस सत्य को जानने के बाद लग था कि यदि मुझे इस वर्ग के लिए कुछ करना है तो मुझे संघर्ष का तरीका बदलना पड़ेगा। इन्हीं की जबान, आस्था, सोच और रहन-सहन के अनुसार अपनी कलम उठानी पड़ेगी और उनको उस खौफ से निकालना होगा जिसे धर्म-ग्रन्थों और ख़ुदा का आदेश बनाकर कठमुल्लाओं ने उन पर थोप रखा है। यह एक बहुत बड़ी हकीकत है कि हम या तो धर्म से डरते हैं या फिर उसके द्वारा दूसरों का शोषण करते हैं या उसे सत्ता समझ लेते हैं, जबकि धर्म केवल योजनाबद्ध तरीके से जीवन जीने का एक रास्ता है। आज धर्म को समझना हमारे लिए बेहद जरूरी हो जाता है क्योंकि उसका गलत प्रयोग इन्सानों की जिन्दगी को बेहद दुश्वार बना रहा है। इसलिए मेरे लिए ये कहानियाँ लिखना बहुत जरूरी था, ताकि मैं वह सारे कानून जो इन्सान के फायदे में जाते हैं, उन्हें अपने लेखन का माध्यम बना साहित्य द्वारा एक नये संघर्ष की शुरुआत कर सकूँ और उस ‘ऐन्शण्ट व़िज्डम’ से लाभ उठा सकूँ जो हमारा अतीत है और वर्तमान पर बुरी तरह हावी है। मुझे विश्वास है कि पाठक इन कहानियों के मानवीय पीड़ा को एक अलग दृष्टि से महसूस करेंगे जो इन्सान की आदिम जरूरत और धर्म के बनाये कानून के बीच सन्तुलन बनाने में उसे पीसती है। वह चक्रव्यूह में फँसा न तो पूरी तरह धर्म का पालन कर पाता, है न ही जिन्दगी को अपनी तरह जीने का हौसला पैदा कर पाता है, क्योंकि एक सच सबसे बड़ा है कि रोज उगनेवाली जिन्दगी हर कानून और विचारधारा से आगे निकल जाती है। तब यह पुरातन बुद्धिमानी अपने-आप बोसीदा होकर तहखाने में इतिहास बन बिसर जाती है। मगर जब तक आपकी याद का हिस्सा है तब तक उसका सही सन्दर्भ जानना जरूरी है। पैगम्बर-ए-इस्लाम को केवल बेटी का पिता होने के कारण अरब समाज, जो लड़की को जिन्दा गाड़ देता था, उन्हें ‘अबतर’ का नाम दे बैठा था, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘दुमकटा’ और दूसरा अर्थ ‘बेऔलादा’ था। इस अपमान पर कुरान में आयत है, जिसमें खुदा फरमाता है कि जो उन्हें इस उपाधि से नवाजते हैं वह नहीं जानते हैं कि उस पैगम्बर की असली औलादें वह ‘उम्मत’ होंगी जो उनकी अनुयायी होंगी। खुदा ने अपने बनाये बन्दों को औरत-मर्द की शक्ल दी है। मगर उन्हें छोटा या बड़ा नहीं बनाया है, जिसकी जिन्दा मिसाल ‘मेराज’ है। पैगम्बर बर्राक नामक घोड़ी पर सवार हो ख़ुदा से मिलने गये थे, जिसके लम्बे-लम्बे बाल, जेवरों और सिर पर रखे ताजवाला औरत का चेहरा था और बाकी धड़ घोड़े का था, जिस पर दो सफेद पंख लगे हुए थे। यहाँ पर प्रश्न उठ सकता है कि अरबी घोड़ा ताकत और फुरती में कई बुलडोजरों के बराबर आँका जाता है। फिर यह जिम्मेदारी ‘मादा’ ने क्यों निभायी। खुदा की इस बराबरी को मद्देनजर रखते हुए पैगम्बर ने अनेक दुश्वारियों और कड़ी आलोचना से गुजरने के बावजूद अपने समय के विरुद्ध जा, सारे कानून औरत के फायदे में बनाये थे। पैगम्बर की बेटी ‘सय्यदा’ की नस्ल से अपने को पहचानवाने वाले सय्यदों का यह कहना कि कानून बनाया उन्हींने ही है। और अपनी इसी पहचान के कारण शिया समाज में सय्यदों का रुतबा है। उनका सीना और हाथ चूमना वास्तव में उस औरत के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना है जिसकी व्यक्तिगत जिन्दगी एक उदाहरण थी, जिसके दामन पर नमाज अदा की जा सकती थी, बचपन के उस खौफ को जहन से निकालने में मेरे अध्ययन ने मेरी सहायता की, जिसने स्थिति को साफ कर यह बताया कि औरत को गुलाम बनाने की एक गहरी साजिश है जिसमें वर्ग-विशेष धर्म का गलत प्रयोग कर रहा है। चूँकि मैं उसी सय्यदों में से हूँ जो अपनी पहचान किसी मर्द से न बनाकर बीबी सय्यदा से जोड़ता है तो मुझे यह कहने का साहस जुटाना होगा कि उन सारे शरीयत पेश करनेवाले वास्तव में धर्म के दोस्त हैं या दुश्मन ? इन्सानियत के हामी हैं या बरबरियत के ? यह औरत को स्वतन्त्रता देना चाहते हैं या कैदखाना ? मेरे लिए शताब्दी के अन्त में, जिसे मैं ‘औरत की अर्द्धशताब्दी’ नाम दे सकती हूँ, खड़े होकर यह सवाल करना बहुत जरूरी लगता है कि चौदह सौ वर्ष पहले ‘औरत’ को देखने का खुला नजरिया हजार नकाबों से क्यों ढक दिया गया है, जब इन्सान ने एक लम्बा सफर पूरा कर अनेक उपलब्धियों से भरा अंजाम दे रखा है ?आज के इस दौर में मेरी अपनी भी जिम्मेदारी है-अपने लेखन, समय और उस वर्ग के प्रति जो पीड़ित है, और इसलिए भी कि मैं उसी सिलसिले की एक कड़ी हूँ, और यह मेरा कर्तव्य भी है। इसलिए उन सारे कानूनों को, जो इन्सान के, विशेषकर औरत के, फायदे में जाते हैं, लबबैक कहती हूँ और अपनी आवाज में पाठकों की आवाज की गूँज सुनने की आशा रखती हूँ, जो मेरी तरह इन विचारों से सहमति रखते हैं; क्योंकि यहाँ मसला केवल औरत का नहीं है बल्कि उन इन्सानी पीढ़िय़ों का है, जो उसके आगोश में आँख खोलती और परवरिश पाती हैं।

नयी दिल्ली14 जनवरी, 1998 -नासिरा शर्मा

ख़ुदा की वापसी

फरजाना युनिवर्सिटी से लौटकर जैसे ही घर में दाखिल हुई, हवा में तैरती शादी की तारीख के पक्की होने का सन्देशा उसे दालान की चौकी पर रखे मिठाई के झाबे ने दे दिया। दिल चाहा कि जल्दी से एक लड्डू मुँह में रख ले, फिर दूसरे पल वह झिझक गयी। उस पर नजर पड़ते ही आँगन में बिखरे कबाड़ को छाँटती हुई चन्दा तेजी से उठी और चहककर बोली, ‘‘बन्नी आ गयी....’’फरजाना उसके इस हमले से घबरा-सी गयी। घर की सभी औरतें अपना-अपना काम छोड़ बड़े दालान की तरफ आने लगीं। बड़ी फूफी को उसने आदाब किया। उन्होंने उसकी बलाएँ ले गले लगाया, खाला अम्मी ने माथा चूमा, तभी चन्दा ने गाना गाना शुरू कर दिया-बन्नी तेरी आँखें सुरमेदानी...‘‘चुप कमब्खत, गला है कि फटा बाँस’’, अम्मी ने उसे झिड़का।‘‘बेगम साहब, नेग-निछावर कुछ मिलिहे कि नाही ?’’ वह अपना गाना छोड़ आँचल फैलाकर सबके सामने घूमने लगी।‘‘यह मुई हरफन-मौला है। एक वक्त में मिरासिन, नायन, मनिहारिन सब बन जाती है।’’ बड़ी फूफी ने पर्स से नोट निकाल उसके आँचल में डाला। ‘‘कोई काम तो लोगन का हमरी वजह से रुकत तो नाही है’’, कहती हुई चन्दा आगे जाकर फिर आँगन का कबाड़ छाँड़ने लगी थी। ‘‘सारे दिन की थकी-हारी आयी है। कैसा नन्हा-सा मुँह निकल आया है, दुल्हन ! जरा शब्बो से कहो, कुछ शरबत-नाश्ता लाये’’, बड़ी फूफी ने फरजाना के चेहरे पर हाथ फेरा। फूफी के कहने से फरजाना की भूख उभर आयी। उसने झाबे को ताका। कोई और दिन होता, तो वह झपट्टा मारकर लड्डू उठाती, पैर हिला-हिलाकर खाती, मगर यह तो उसकी...‘‘कल सुबह पुताईवाले आवे को हैं और ई चौधराइन सुबह से सामान छाँट नाहीं पायी है।’’ शब्बो बड़बड़ायी और नाश्ते की सेनी लेकर आँगन पार करने लगी। ‘‘तोका एक चीज न देबै, समझी कल्लो की माई !’’ चन्दा चिढ़ गयी। थोड़े हैं, जो कूड़ा-करकट सँभालें’’। शब्बो मटकती हुई आगे बढ़ी और चौकी पर सेनी रखी और लौटी। ‘‘हम जैसे जानित नाही हैं का, कि तोका देनेवाले बहुत हैं गुइयाँ’’, कहकर चन्दा जोर से हँसी। उसके कटाक्ष पर शब्बो के तेवरी पर बल पड़ गये। तड़पकर बोली, ‘‘तोहरे दिमाग मा कीड़े हैं, जो गन्दी बात सोचत है। अरे, हमार मतलब रहा...।’’‘‘छोड़ कल्लू की माई, तोहार मतलब हम सब जानित हैं’’, इतना कह चन्दा हँसती हुई सामान छाँटने लगी। शब्बो ने खिसियाकर उसको ताका, फिर तेजी से रसोई की तरफ कदम बढ़ाये और पटरा जोर से पटका। ‘‘तुम लोगों की जबान कभी बन्द रहेगी ?’’ अम्मी ने दोनों को डाँटा। फरजाना कमरे में पहुँचकर उलझने लगी। बेकरारी में इधर-उधर चक्कर लगा वह धम्म से बिस्तर पर बैठ सोचने लगी कि आखिर वह इतनी आसानी से शादी के लिए राजी क्यों हो गयी। उसे एम.ए. करना था। आई.ए.एस. में बैठना था। अम्मी-अब्बू को एक लड़का क्या पसन्द आ गया, उन्होंने आँखें ही फेर लीं। उन्हें अब कुछ भी याद नहीं, न अपना वायदा, न उसका सपना...मेरी शादी है, मगर मुझसे ही नहीं पूछा गया। बस....शाम को चिराग जलने के बाद घर के मर्द भी नहा-धोकर आँगन में आन बैठे। फूफी जान और खाला अम्मी मिठाई का आधा झाबा घरों में भेजकर अब बैठी सुस्ता रही थीं। आँगन के किनारे की पलँग पर फरमाना भी आकर लेट गयी थी और हाथ में पकड़ी पत्रिका को पढ़ने में व्यस्त दिख रही थी, मगर उसके कान सबकी बातों की तरफ लगे हुए थे।‘‘मेहर की रकम पक्की हो गयी, इरशाद ?’’ बड़ी फूफीजान ने भाई से पूछा। ‘‘आपका इन्तजार था। अभी तक सारी शादियाँ घर में हुई थीं। रस्म के मुताबिक चौदह हजार बँधता था’’‘‘चौदह की गिनती मुबारक ठहरी, चौदह मासूमीन का नम्बर है, मगर यह शादी तो गैरों में हो रही है’’, फूफी ने फिक्र जाहिर की। ‘‘इस हिसाब से फूफी जान, एक लाख चौबीस हजार पर मेहर बँधना चाहिए, बड़ा मुबारक नम्बर है।’’ फिरोज ने गहरी आवाज बना फूफी को ताका।‘‘कैसे ?’’ फूफी ने बड़ी-बड़ी आँखें घुमायीं।‘‘अरे, अभी तक जितने इमाम हुए हैं, उनकी गिनती एक लाख चौबीस हजार है।’’ फिरोज ने बड़ी गम्भीरता से कहा।‘‘कहता तो ठीक है’’, फूफीजान सोच में डूब गयीं।‘‘बिजनेस ठीक चल रहा है उनका, वे लोग मान जाएँगे फूफीजान’’, फिरोज चहका। ‘‘कब से दूसरों की जेब टटोलने लगे हो ? अरे, जो अपने खानदान में होता चला आया है, उसकी बात करो’’, खाला चिढ़कर बोलीं। ‘‘लाख भी क्या ज्यादा है बाजी ? जमाना अब वह तो रहा नहीं कि बीबी के निकाह की तरह तीन रुपये में मेहर बँध जाए। हजार खतरे हैं, रोज नयी-नयी कहानियाँ सुनने को मिलती हैं। लड़की की कुछ तो मजबूती होनी चाहिए, ले-देकर इकलौती तो बेटी है’’, माँ ने धीरे से कहा। ‘‘कल शाम मौलवी इमाम आये थे। कहने लगे कि मेहर जितना ज्यादा बँधवा लो, उससे क्या फायदा ! लड़केवाले शान में आकर राजी हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें देना तो एक छदाम नहीं है। दिल को बहलाना है, जितने का बँधवा लो, वरना इस्लाम के मुताबिक तो निकाह के फौरन बाद मेहर की रकम की अदायगी का हुक्म है, मगर यहाँ सुनता कौन है। सब नये-नये कानून अपनी सहूलियत की वजह से बना रहे हैं। नाम इस्लाम का ले रहे हैं, मगर मैं सोचती हूँ, चाहे पहले या चाहे बाद में, देनेवाले तो देते हैं। मेरा ही देखो, मकान मेहर के एवज में दे गये तुम्हारे बहनोई। अपने किनारे इज्जत से बैठी हूँ। यही हाल फिज्जा का है, अमरूद और आम के दोनों बाग मेहर में मिले हैं। चैन से रोटी खा रही है।’’ बड़ी फूफी बोली। ‘‘वह तो पचास, पचहत्तर जितनी रकम हम चाहेंगे, वे उस पर राजी हो जाएँगे। इतना पीछे पड़े हैं, कहते हैं, असगर मास्टर की इतनी इज्जत है लड़की पढ़ी-लिखी है। हमें ऐसा ही घर चाहिए था, जिससे हमारी शान बढ़े। पैसा तो हाथ का मैल है। इसलिए दहेज में फूटी कौड़ी नहीं चाहिए’’, इरशाद ने कहा।‘‘ऐ है, उनके चाहने से क्या होता है ! क्या हम अपनी लड़की नंगी बुच्ची रुख्सत करेंगे....अरे वाह’’, बड़ी फूफी तमक उठी।‘‘मुझे लगता है शम्मो, पचास हजार मुनासिब रहेगा। फिर, आपस में एतमाद की बात भी होती है। बाकी खुदा भरोसे छोड़ते हैं !’’ खाला बोली। ‘‘ठीक है..पचास मुनासिब गिनती है...एक लाख पर शायद वे राजी न हों। बेकार में बात खाली जाए या फिर बेकार की बदमजगी हो’’, इरशाद ने सोचते हुए कहा।‘‘बदमजगी कैसी ? पचास हजार की औकात क्या है आज, कल तो खाक होगी’’, अम्मी ने कहा।‘‘फूफीजान, एक लाख चौबीस हजार...पूरे चौहत्तर हजार का घाटा है’’, फिरोज ने धीरे से कहा। ‘‘चुप नासपीटे ! हर बात में मजाक’’, बड़ी फूफी खफा होने के अन्दाज से मन्द-मन्द मुसकराती हुई बोलीं और भतीजे का सिर गोद में रखकर सहलाने लगीं। ‘‘मर्द-औरत के रिश्ते में मोहब्बत के अलावा अब हजार तरह की गुत्थियाँ उलझ चुकी हैं, वरना ये सब उलझनें हमें परेशान क्यों करें ?’’ इरशाद ने कहा। फरजाना सबकुछ सुनकर भिन्ना रही थी। सबको रकम की पड़ी है। मेहर कितना बँधेगा, बरी में कितने जोड़े, जेवर, शक्कर और मेवे के कितने घड़े आएँगे, मगर कोई नहीं पूछता कि क्या वह मुझे आगे पढ़ने देंगे ? युनिवर्सिटी जाने देंगे ? आई.ए.एस.के मुकाबले में बैठने देगें ? उसका क्रोध आँसू की शक्ल में बहने लगा। कैसी शान से दोस्तों के सामने कहती थी, मैं अभी शादी नहीं करूँगी, पढ़ूँगी, मगर...‘‘न रो बेटी, सबको एक दिन बाबुल छोड़ना पड़ता है। रंक हो या शाह, सबको बेटी बिदा करनी पड़ती है।’’ कहकर खाला रो पड़ीं और उनके साथ सबकी आँखें भर आयीं। फरजाना सबसे जान छुड़ा पैर पटकती कमरे की तरफ भागी और गुस्से में भर कारनिस पर रखे पुरस्कार में मिले कप और शील्ड की कतार को जमीन पर फेंका, फ्रेम किया सर्टीफिकेट उतारा। अगर चन्दा हाथ न पकड़ लेती, तो वह भी चकनाचूर हो जाता।

कुइयाँजान -नासिरा शर्मा


नासिरा शर्मा



बताशेवाली गली में सुबह फूट चुकी थी, मगर उसका उजाला तंग गली में अपना दूधिया रंग अभी बिखेर नहीं पाया था। मंदिर की घंटी और दूध वाले की साइकिल की टनटनाहट से एक-दूसरे से सटे घर कुनमुना उठे। चंदन हलवाई दातून करता घर के बाहर बने पतले चबूतरे पर आकर बैठ गया। कुत्तों ने भी अंगड़ाई ले बदन सीधा किया और उसे देखकर अपनी दुम हिलानी शुरू कर दी, मगर चंदन उनसे बेगाना बना दातून चबाता रहा। उसकी आंखों से नींद का खुमार अभी उतरा नहीं था। कल रात शादी की पार्टी से लौटते-लौटते दो बज गए थे। एकाएक मद्धिम सुरों से रेंगती छमछम की आवाज चंदन की चेतना से टकराई। इतनी सुबह किसकी विदाई हो रही है ? जब पायजनी का स्वर निरंतर पास आता चला गया तो उसने अपनी मिचमिचाई आंखें खोली और एकदम से झुंझला उठा। ‘‘सत्यानाश ! रंगीले, रसीले की जोड़ी कहां से आय मरी है। सारे दिन का अब भगवान ही मालिक है।’’
कुत्तों ने दौड़कर रंगीले, रसीले को घेरा और उन्हें सूंघने लगे। रसीले ने हाथ में पकड़ी ढोलक पर थाप मारी। कुत्तों ने पीछे हटकर उन दोनों को घूरा, फिर अपना एतराज दर्ज कराते भौंक उठे। ‘‘कहां जात हो रसीले, इतनी सुबह सुबह ?’’ भड़भूजन जो लोटा भर-भरकर सिर पर डाल रही थी, एकाएक हाथ रोक पूछ बैठी।
‘‘बनत तो ऐसे हो चाची, जैसे तोका खबर नहीं।’’ रंगीले ने बदन को झटका देते हुए जोर से ताली बजा, ठुमका लगाया।
‘‘अरे पन्नवा के घर कल रात बेटवा भवा है न !’’ पनवाड़िन अपने पोते का मुंह धुलाते हुए बोली। ‘‘बूढ़े मुंह मुहांसा !’’ भड़भूजन कह हँस पड़ी।
झुंझलाया चंदन कुल्ली कर, मुह पर छीटें डाल दूकान के तखते पर सोए पड़े लड़के को आवाज देने लगा। हलवाइन ने अंदर से आकर चाय का लोटा थमाया और दुकान जा, शीशे के केस से मोतीचूर के चार-पांच लड्डू उठा अंदर घर में चली गई।
बताशेवाली गली जैसे-जैसे जाग रही थी, जिंदगी के आसार बढ़ रहे थे। रामदीन धोबी का ट्रांजिस्टर रोज की तरह चालू हो गया था, जिसके गाने की आवाज में रिक्शे की घंटियों ही नहीं, बल्कि आस-पास वाले भी स्वर से स्वर मिला रहे थे। नल पर पानी भरने की जल्दी में अब औरतें अपना धैर्य खोने लगी थीं। सुरंग जैसी इस गली में नमी भरी गंध हरदम तैरती रहती थी और दोनों तरह बहती काली नालियां हमेशा चालू रहती थीं, जिनमें सूअर के नन्हे बच्चे अकसर फिसलकर गिर जाते, तब छौने के साथ सुअरनी की कें-कें से सबका जीना हराम हो जाता था।
धूप फैलने के साथ ही बताशे वाली गली में पन्नालाल सुनार के यहां लड़का पैदा होने की खबर गरमा गई थी। आखिर पूरे अट्ठारह वर्ष बाद बेटा हुआ था ! बात तो आश्चर्य की थी ही। पन्ना सुनार की उम्र चालीस-पैंतालीस की होने को आई थी। उसके मित्रों के बच्चे जवान हो रहे थे। समय गुजरने के साथ पन्ना की आशा-निराशा में बदलने लगी थी। अगर कोई ग्राहक खुश होकर बच्चा होने की दुआ दे बैठता तो पन्ना खौखिया जाता था। धंधे के चलते खून का घूंट पीकर रह जाता, मगर अंदर ऐसा बवंडर उठता कि मन करता, सामने वाले को काट खाए। जब गली में बच्चे शोर मचाते तो वह काम करते हुए सिर उठा उन्हें घूरता, फिर बेलाग हो मोटी-मोटी गालियां सुनाने लगता, जिसके चलते अकसर पड़ोसियों से उसकी झड़प हो जाती थी। वह कारीगर अच्छा था, मगर दिन-ब-दिन उसकी चिड़चिड़ाहट बढ़ती जा रही थी, जिससे लोग उससे कतराने लगे थे।
इस समय पन्नालाल दुकान के सामने पतले से चबूतरे पर बैठा, मंद-मंद मुस्कराता घर के अंदर से गूंजते सोहर गीत को सुन रहा था। आज उसका कलेजा सौ गज का हो गया था कि उसने मर्दानगी का सुबूत दे दिया। जो भी आते-आते उसे बधाई देता, वह उत्साह में भर उसे छठी पर आने का न्यौता दे बैठता था। अंदर जब रसीले की ढोलक की थाप और रंगीले का नाच खत्म हुआ तो वह घर में घुसा। बेटे का चेहरा देखने की लालसा कब से दबाए वह बैठा पत्नी की दर्द में डूबी चीखों को सुनता रहा था। उसकी तबीयत लगभग एक डेढ़ बजे रात को खराब हुई थी। गली में रहने वाली इकलौती दाई या नाइन, जो भी कहो, रमजानी को वह जाकर बुला लाया था। सुबह चार बजे रमजानी ने बेटा होने की खबर दी थी। तब से अब तक उसने ये चार घंटे गुजारे हैं, यह उसका दिल ही जानता है। ‘‘लेव, देखो बेटवा का मुंह और निहाल कर देव आज रमजानी को।’’ कहती हुई रमजानी पुरानी साड़ी में नंगा-सा काला-कलूटा बच्चा लिए खड़ी थी। पन्ना सुनार की बेकरार आंखें बेटे के मुंह पर पड़ीं और उसका दिल खुशी से नाच उठा।
‘‘कितना सुंदर ! कितनी मनमोहिनी सूरत है इसकी, जैसे स्वयं मुरली मनोहर साक्षात अंखियन के सामने आय गये हों।’’ गद्गद हो पन्ना मन-ही-मन बोल उठा।
इसके होंठ कांपे और आंखें नम हो गईं। उसने दोनों हाथ सीने पर जोड़ उपर वाले को धन्यवाद दिया।
पत्नी मालती का हाल अच्छा न था। वह नीमबेहोश- सी बिस्तर पर पड़ी थी। खून बहुत बह गया था। पन्ना ने अंदर जाकर उसके माथे पर हाथ रखा फिर उसके ठंडे पड़ते हाथों को सहलाया। तभी एकाएक रमजानी चीखी, ‘‘अरे लालाजी, तोहार यहां का काम, जो सोहर की कोठरिया में घुस आए ? चलो, बाहर निकलो।’’
शाम तक मालती की हालत काफी संभल चुकी थी। रमजानी सब कुछ समेटकर घर जा चुकी थी। गांव से आई बूढ़ी मौसी ही मालती की देखभाल कर रही थीं। पन्ना ने आज दुकान बंद रखी थी। उसी के सामने बने पतले चबूतरे पर वह आसन जमाए गली की बढ़ती रौनक को ताक रहा था। आज मलाई बर्फ वाले को देखकर शोर मचाते बच्चे इसे कांटों की तरह नहीं चुभे बल्कि उसने मलाई बर्फवाले को बुलाकर सारे बच्चों को दोना बांटने को कहा और हिसाब कर पैसा खुद अदा किया। उछलते, बर्फ चाटते बच्चों की खुशी देख उसके दिल में संतोष की लहरें बन रही थीं कि एक दिन उसका कन्हैया भी इन्हीं के बीच उछले- कूदेगा।
बताशेवाली गली से ही मिली दाहिनी ओर पेंचदार गली थी। जिसके अंत में नीम के पेड़ों में घिरी एक पुरानी टूटी-फूटी मसजिद खड़ी थी, जिसमें जाने कब से बूढ़े मौलाना रहते थे। वही अजान देते, वही नमाज पढ़वाते और वही मरने जीने की जिम्मेदारी भी निभाते थे। उस मसजिद में हांके-पुकारे के लिए एक लड़का भी रहता था। जिसका नाम बदलू था। अजान की जगह सुबह-सुबह उसके रोने की आवाज सुनकर मसजिद के पास वाले घर की छत से किसी ने पूछ लिया :‘‘कस बे बदलू, आखिर बात का है जो रोवत हो ?’’
‘‘मौलवीजी उठ नहीं रहे हैं।’’ बदलू ने रोते-रोते कहा और मसजिद से बाहर निकला। सामने से रोज आने वाले बुजुर्ग नमाजी लाठी टेकते एक-दूसरे का सहारा बने चले आ रहे थे। मसजिद से लगी खस्ता कोठरी में अस्सी साल के मौलाना आंखें बंद किए साकित पड़े थे। चेहरे पर शांति छाई थी। एक नमाजी ने आगे बढ़कर नब्ज, फिर नाक के पास हाथ लगाकर देखा और घबराकर पूछा, कब हुआ इंतकाल ?’’
‘‘हमें कुछ पता नहीं। हमने सोचा कि सो रहे हैं। सुबह से बंदर बहुत परेशान कर रहे थे। हम उनको भगाने में लगे थे...देखें तो हौज के पानी में लोट-लोटकर कैसा गंदा कर दिया है।’’ बदलू ने आंसू पोंछते हुए कहा।
‘‘कफन-दफन शाम तक हो जाता तो अच्छा था। गरमी का महीना है।’’ दूसरे बुजुर्ग ने फिक्र भरी आवाज में कहा।
‘‘हां, बात मुनासिब है।’’ तीसरे ने सोचते हुए कांपती आवाज में जवाब दिया।
‘‘आज तो इधर का बाजार भी बंद है।’’
‘‘तौलियावाले शेखजी तो अपनी ही गली में रहते हैं। चलकर बात करते हैं। उन्हें छुट्टी के दिन दुकान खोलने में क्या एतराज हो सकता है। आखिर मौत सारा सुभीता देखकर थोड़े आती है।’’‘‘पानी के साथ पानी भरने के बरतन का भी इंतजाम करना होगा।’’
‘‘अब तो कोरे मटके लाने होंगे, कौन अपना बरतन देगा ! सबको पानी भरना होगा अपना-अपना।’’ पहले ने इधर-उधर नजर दौड़ाते हुए कहा।
‘‘बदलू, इधर आ। मौलाना साहब,....मेरा मतलब है कि रुपया-पैसा कहां रखते थे ?’’ पहले ने झिझकते हुए पूछा।
‘‘सिरहाने गुदड़ी के नीचे।’’ बदलू ने आगे बढ़कर चादर के नीचे हाथ डाला और टटोलकर कुछ रुपये और रेजगारी निकाली।
‘‘गिनो तो !’’ दूसरा बोला।
‘‘कुल छह सौ एक और पचहत्तर पैसे हैं।’’ बदलू ने ठंडी सांस भरते हुए कहा।
‘‘रकम इतनी कम और सामान की फेहरिस्त लंबी।’’ दूसरे बुजुर्ग बड़बड़ाए।
तीनों बुजुर्गों के चेहरों पर चिंता उभर आई। उनके घरों में तो इस रकम का आधा भी न था। महीने का अंत था। जेब, कनस्तर सब खाली थे। चंदा भी दें तो किस बलबूते पर, बेटे बहू के सामने हाथ फैलाएं तो कैसे, जब कि वही उन पर बोझ बने हैं। तीनों परेशान, बेबस से कुछ पल खड़े एक-दूसरे को देखते रहे। मौलाना बरसों पहले अकेले यहां आए थे। उनका खानदान कहां था, यह किसी को पता नहीं था, जहां तक उन्हें याद आता है, बुजुर्गवार अकसर कहा करते थे कि इस फानी दुनिया में बदलू ही मुझ लावारिस का इकलौता सहारा है। इस जुमले से लोगों ने समझ लिया था कि मौलाना के ‘आगे नाथ न पीछे पगहा’, मगर मामला अब मौत का था, खर्चे का था। पास के होटल से मौलाना खाना मंगवाते थे। सस्ते दामों में होटलवाला रोटी-शोरबा देकर यह समझता था कि वह बड़ा नेक काम कर रहा है। जन्नत में अपनी जगह बना रहा है। मौलाना की आमदनी तो कुछ थी नहीं, सिवाय उस ‘फितरे’, के जो दो-तीन घरों से उन तक पहुंचता था, जिससे उनका खर्च जैसे-तैसे चल जाता था। तीनों पड़ोसियों ने यही उचित समझा कि उन्हीं साहेबान को मौलाना के इंतकाल की खबर दे देनी चाहिए। फिर वे जो सलाह देंगे उसी के मुताबिक इनके आखिरी सफर का बंदोबस्त कर दिया जाएगा।
धूप निकल आई थी और गरमी गजब की थी। लाश के खराब हो जाने का डर भी था। पता नहीं कब उनकी रूब बदन छोड़कर ऊपर परवाज कर गई हो, इसलिए बर्फ की सिल मंगवाकर लाश उस पर रख दी गई थी। तौलियावाले शेखजी ने आधे दाम पर दुकान खोल, कफन का चालीस मीटर कपड़ा फौरन नापकर फाड़ दिया। मटके खरीदकर बदलू ले आया था। समस्या अब पानी की थी। चौराहे के खंभे में आग लगने से तार जल गए थे। कल दोपहर से पूरे इलाके में बिजली नहीं थी, जो पानी आता। बचे हुए पानी से सबने किसी तरह अपना काम चला लिया था, मगर गुस्ले-मैयत के लिए तो घड़ों पानी चाहिए था। कुछ घरों में दो-तीन बाल्टी पानी मौजूद था, मगर वह पाक नहीं था। दोपहर का सूरज ढलने ही वाला था। लोगों की परेशानी बढ़ रही थी। इत्रवाले ने खबर मिलते ही उन लोगों की रुपयों से मदद कर दी थी, मगर घर दूर होने की वजह से पानी वहां से लाया नहीं जा सकता था। बदलू बौराया सा घर-घर झांकता घूम रहा था।
मोहल्ले के कुएं बरसों पहले कूड़े से पाट दिए गए थे। एक-दो घरों में हैंडपाइप थे, जो खराब पड़े थे। मसजिदवाली गली से मिली अंदरसेवाली गली थी। वहां पक्के बड़े-बड़े घर थे। उनके यहां भी पानी की हाय-तौबा मची थी। शिव मंदिर के पुजारी भी बिना नहाए परेशान बैठे थे। उन्होंने न मंदिर धोया था, न भगवान् को भोग लगाया था। उनके सारे गगरे-लोटे खाली लुढ़के पड़े थे। नल की टोंटी पर कई बार कौआ पानी की तलाश में आ आकर बैठ उड़ चुका था। गरमी ऐसी कि पसीना पानी की तरह शरीर से बह रहा था। पता नहीं किस आशा में पंडितजी बार-बार नल खोलते, फिर बंद कर बड़बड़ा उठते, ‘‘पग-पग रोटी, डग-डग नीर....मगर अब ई शहर का कईसा हाल बनाय दिए हो भगवान्। न पानी है, न रोटी है।’’

एक थी सुल्ताना

नासिरा शर्मा



कल्लू दर्जी की एक लड़की थी। उसका नाम सुल्ताना था। सुल्ताना को कल्लू दर्जी बहुत चाहता था। वह उसकी इकलौती लड़की थी। कल्लू उसकी शादी किसी पढ़े-लिखे लड़के से करना चाहता था। जब सुल्ताना जवान हुई तो सारे मुहल्ले की नजर उस पर थी। सब उसे अपनी बहू बनाना चाहते थे, सुल्ताना बहुत हँसमुख थी। घर का सब काम जानती थी चार कलास पास थी। शबरातन की बहन जुमेरातन अपने बेटे शकूर से उसकी शादी करना चाहती थी। शकूल पांच कलास पास था। वह एक बिजली की दुकान में नौकर था। कल्लू ने शादी करने से मना कर दिया।

कुछ दिनों बाद सुल्ताना के लिए करीम का रिश्ता आया। लड़का बारह कलास पास था। नौकरी नहीं करता था मगर खाता पीता घराना था। कल्लू ने झट से हाँ कर दी। खूब धूमधाम से बेटी की शादी की। सुल्ताना जब दोबारा ससुराल से मायके आई तो शबरातन को वह थकी-थकी सी लगी। माँ बाप के पूछने पर उसने बताया कि करीम को लाटरी के टिकट खरीदने की लत है। सिनेमा भी रोज देखता है। घर में पैसा न मिलने पर मां से लड़ता है। घर से भाग जाने की धमकी देता है कमाने का उसे शौक नहीं है। करीम की माँ को उम्मीद है कि बहू बेटे को सुधार लेगी। करीम सुल्ताना से ज्यादा दोस्तों के साथ रहता है। दो-दो बजे रात को घर लौटता है।

नये-नये विहान में

धर्मवीर भारती



नये-नये विहान में
असीम आस्मान में-
मैं सुबह का गीत हूँ।
मैं गीत की उड़ान हूँ
मैं गीत की उठान हूँ
मैं दर्द का उफ़ान हूँ
मैं उदय का गीत हूँ
मैं विजय का गीत हूँ
सुबह-सुबह का गीत हूँ
मैं सुबह का गीत हूँ
चला रहा हूँ छिप के
रोशनी के लाल तीर मैं
जगा रहा हूँ पत्थरों के
दिल में आज पीर मैं
गुदागुदा के फूल को
हँसा रहा हूँ आज मैं
ये सूना-सूना आस्मां
बसा रहा हूँ आज मैं
सघन तिमिर के बाद फिर
मैं रोशनी का गीत हूँ
मैं जागरण का गीत हूँ
बादलों की ओर से
छिप के मुस्करा उठूँ
मैं जमीन से उड़ँ
कि आस्मां पे छा उठूँ
मैं उड़ूँ कि आस्मां के
होश संग उड़ चलें
मैं मुड़ूँ कि जिन्दगी
की राह संग मुड़ चलें
मैं जिन्दगी की राह पर
मुसाफ़िरों की जीत हूँ
स्वर्ण गीत ले
विहग कुमार-सा चहक कर
मैं खिजाँ की डाल पर
बहार-सा महक उठूँ
कण्टकों के बन्धनों में
फूल का उभार हूँ
मैं पीर हूँ मैं प्यार हूँ
बहार हूँ खुमार हूँ
भविष्य मैं महान् हूँ
अतीत हूँ, वर्तमान हूँ
मैं युग-युगों का गीत हूँ
युग-युगों का गीत
मैं सुबह का गीत हूँ !!

Friday, November 7, 2008

नेहरू की प्रासंगिकता - शिवप्रसाद सिंह


जिन्दगी

सीमा गुप्ता

जीने का फकत एक बहाना तलाश करती ये जिन्दगी,
अनचाही किसकी बातें बेशुमार करती ये जिन्दगी...

कोई नही फ़िर किसे कल्पना मे आकर देकर,
यहाँ वहां आहटों मे साकार करती ये जिन्दगी...

इक लम्हा सिर्फ़ प्यार का जीने की बेताबी बढा,
खामोशी से एक स्पर्श का इंतजार करती ये जिन्दगी॥

ना एहतियात, ना हया, ना फ़िक्र किसी जमाने की,
बेबाक हो अपना दर्द-ऐ-इजहार करती ये जिन्दगी...

रिश्तों के उलझे सिरों का कोई छोर नही लेकिन,
हर बेडीयों को तोड़ने का करार करती ये जिन्दगी...

बंजर से नयन, निर्जन ये तन, अवसादित मन,
उफ़! इस बेहाली से हर लम्हा तकरार करती ये जिन्दगी....

Wednesday, November 5, 2008

जाने जिगर

सीमा गुप्ता

राह पे पथरा के बर्फ सी जम गयी नजर ,
पलट के एक बार भी ना देखा,
जाते- जाते किस अदा से कहर ढा गया..
जो कहता था मुझे कभी अपनी जाने जिगर ...

मुस्लिम एक नया परिप्रेक्ष्य - के. मलकानी


Monday, November 3, 2008

वीरानो मे

सीमा गुप्ता

खामोश से वीरानो मे,
साया पनाह ढूंढा करे,
गुमसुम सी राह न जाने,
किन कदमो का निशां ढूंढा करे..........
लम्हा लम्हा परेशान ,
दर्द की झनझनाहट से,
आसरा किसकी गर्म हथेली का,
रूह बेजां ढूंढा करे..........
सिमटी सकुचाई सी रात,
जख्म लिए दोनों हाथ,
दर्द-ऐ-जीगर सजाने को,
किसका मकां ढूंढा करें ...........
सहम के जर्द हुई जाती ,
गोया सिहरन की भी रगें ,
थरथराते जिस्म मे गुनगुनाहट,
सांसें बेजुबां ढूंढा करें................

Saturday, November 1, 2008

प्यार का ग्राफ- राही मासूम रजा


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